जहां तक मेरी याद जाती है हमारा देश स्त्रियों का पूरी तरह से सम्मान और सुरक्षा देने के लिए प्रसिद्ध रहा है। विदेशियों के आगमन से पहले हर तरह से प्रगतिशील रहे हम बीच के कुछ वर्षों में अपनी पहचान पूरी तरह से खो बैठे और गुलामी ही हमारी कमजोरी बन गयी। हमारा विकास अधूरा ही रहेगा जब तक हम नारियों को उनके अधिकारों से वंचित करेंगे। इतिहास गवाह है हमारे देश की नारियों के धैर्य और असाधारण क्षमताओं का लेकिन आज हम स्वाभाविकता से नारियों का अपमान करने में एक सुख और गर्व का अनुभव करते हैं। जब हमारे परिवार या किसी अन्य नारी अपनी आँखों के सामने अपमानित होते देखते हैं तो हमारी दबी अनुभूतियाँ ऊपर आकर उनकी रक्षा के लिए आतुर हो, हम खुद को अपने स्वाभाविक रूप से अलग पाते हैं। इसका मतलब साफ़ ज़ाहिर है कि हमारे अंतर्मन में कहीं गहरे हमारे संस्कार अपनी जड़ जमाये हैं लेकिन अपने स्वार्थ की वजह से हम उनका परित्याग करने में नहीं हिचकते, क्यों ? बेटियों का अच्छी जगह विवाह करने की इच्छा हर एक पिता की होती है लेकिन पत्नी को हम क्यों उसके अधिकारों से वंचित करने में सुख ढूंढते हैं ? हम बिना किसी झिझक के क्यों ऐसा व्यवहार करते हैं, शायद अपने नपुंसक मन को एक झूठी तृप्ति देने के लिए लेकिन इसके घातक परिणाम झेलने के लिए न ही हमारे मन में ताकत है और न ही इच्छा।
जब हम पूरी तरह से खान पान और रहन सहन में विदेशियों की तरह रहने में खुशी पाते हैं तो क्यों हम उनकी ही तरह अपने परिवार की स्त्रियों को स्वतंत्रता और इज़्ज़त नहीं दे पाते ? हमारा नजरिया इकतरफा हो चुका है और दिमाग शिथिल। किसी भी ज़माने में हमने महिलाओं को अपमानित होने नहीं दिया लेकिन अब तो जान लेने में भी हिचकते नहीं क्योंकि हमारा मानसिक स्तर गिर चुका है और हम इसमें अपनी शान समझने लगे हैं।
किसी भी ज़माने में स्त्रियां कमजोर नहीं रहीं , हमने उनको परिवार का वास्ता देकर घर की चहारदीवारों में कैद करके एक आत्मतृप्ति महसूस की , स्त्रियों ने अपना कर्तव्य खुशी खुशी निभाया और हर एक परिस्थिति में अपने परिवार को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार किया , क्या यह उनके त्याग और सहनशीलता का उदाहरण नहीं? हमें हर एक मुश्किल में पूरे मन से साथ देकर हमारे हौसले बढ़ाये, जब भी मन से हमने निरुत्साहित महसूस किया, उम्मीद की एक किरण बनकर बेटी, बहन, दोस्त, पत्नी, मां, भाभी हर रूप में हमारा साथ दिया। हमारी प्रेरणा स्त्रोत्र को हम इतनी आसानी से कुचलने में नहीं हिचकते , कैसे हमारा मन हमारा साथ इस तुच्छ और घृणित नज़रिये को व्यवहार में लाने की अनुमति देता है?
जब हम पूरी तरह से खान पान और रहन सहन में विदेशियों की तरह रहने में खुशी पाते हैं तो क्यों हम उनकी ही तरह अपने परिवार की स्त्रियों को स्वतंत्रता और इज़्ज़त नहीं दे पाते ? हमारा नजरिया इकतरफा हो चुका है और दिमाग शिथिल। किसी भी ज़माने में हमने महिलाओं को अपमानित होने नहीं दिया लेकिन अब तो जान लेने में भी हिचकते नहीं क्योंकि हमारा मानसिक स्तर गिर चुका है और हम इसमें अपनी शान समझने लगे हैं।
किसी भी ज़माने में स्त्रियां कमजोर नहीं रहीं , हमने उनको परिवार का वास्ता देकर घर की चहारदीवारों में कैद करके एक आत्मतृप्ति महसूस की , स्त्रियों ने अपना कर्तव्य खुशी खुशी निभाया और हर एक परिस्थिति में अपने परिवार को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार किया , क्या यह उनके त्याग और सहनशीलता का उदाहरण नहीं? हमें हर एक मुश्किल में पूरे मन से साथ देकर हमारे हौसले बढ़ाये, जब भी मन से हमने निरुत्साहित महसूस किया, उम्मीद की एक किरण बनकर बेटी, बहन, दोस्त, पत्नी, मां, भाभी हर रूप में हमारा साथ दिया। हमारी प्रेरणा स्त्रोत्र को हम इतनी आसानी से कुचलने में नहीं हिचकते , कैसे हमारा मन हमारा साथ इस तुच्छ और घृणित नज़रिये को व्यवहार में लाने की अनुमति देता है?
हमारे देश में लक्ष्मीबाई , विजयलक्ष्मी पंडित , गार्गी , इंदिरा गांधी , किरण बेदी , कल्पना चावला, मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी , सोनिया गांधी , मदर टेरेसा , सरोजिनी नायडू जैसी वीर और जुझारू स्त्रियों की कमी नहीं लेकिन हमारा नजरिया ठीक नहीं। हम तो बेहिचक बेटियों की संख्या कम करने में अपनी इज़्ज़त समझने लगे हैं। कल को हमारा नाम रौशन करने के लिए बेटियां ही नहीं होंगी!! सोचिये और अपने बदलते नज़रिये को सुधारिये , हर इंसान अपनी माँ और बहिन से प्यार करता है तो फिर खुद की ज़िन्दगी संवारने वाली पत्नी और खुशियां बिखेरने वाली बेटियों के लिए क्यों हम अनजाने ही अपना नजरिया संकीर्ण होने दें ? भारतीय संस्कृति अपनी अलग पहचान रखती है और अपनी मातृभूमि की खुशबू हमें बरक़रार रखनी ही होगी....
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