ऐ मेरे उदास मन , चल दोनों कहीं दूर चलें , मेरे हमदम तेरी मंजिल, ये नहीं ये नहीं कोई और है.. . … ऐसे ही सोचते सोचते मेरी जिंदगी चली जा रही है और मैं भी पीछे-पीछे एक मूक दर्शक बना चला जा रहा हूं। कहां तक चलना है , कहां ठहरना है कुछ नहीं पता , समय अपनी रफ़्तार से पंख पसारे चलता रहता है और मैं भी. . .
आज तकरीबन लगभग मेरी आधी उम्र गुजरने के बाद मुझे अचानक यह अहसास होना सभी के लिए उपहासजनक हो सकता है लेकिन मेरे लिए मेरे अस्तित्व की पहचान की शुरुवात कहना ही उपयुक्त होगा। इतनी दूर सफर तय करने के बाद क्यों ये अजीब सी उथल-पुथल मन को बावला बना रही है ? मैंने अपने मन को झिंझोड़ना चाहा लेकिन मेरा मन तो अतीत में गोते लगा रहा था , सबसे बेखबर , जब मैं 25 का था और जिंदगी का हर पड़ाव बेहद खूबसूरत।
पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने नौकरी करना बेहतर समझा और फिर शुरू हुआ एक अनंत सिलसिला चुनाव का , हर किसी जगह में कोई न कोई नुक्स निकल ही जाता था। यदि मुझे पसंद होता तो भैया मना करते और यदि सबको पसंद होता तो शहर दूर होने से, वहां भेजने की सहमति नहीं मिलती। इसी उधेड़बुन में मैं थोड़ा उदास सा हो चला था। मेरे कई सहपाठी दूसरे शहरों में थे और कई व्यापार करने को उत्सुक नजर आ रहे थे , लेकिन कोई भी मुझ जैसा नहीं था जो न इस तरफ न उस तरफ हो।
आखिरकार मैंने सभी का लिहाज करने से बेहतर फैसला करना समझा और पास ही के शहर में कॉलेज में पढाने का अवसर जाने न दिया , हालांकि थोड़ी नाखुशी महसूस की परिवार से अलग होने में, फिर खुद को समझा लिया। आज मैंने खुद की नज़रों में अपने को एक जिम्मेदार इंसान पाया और एक आत्म तृप्ति महसूस की। दिन सप्ताह और सप्ताह महीने में बदले और मेरी पहली तनख्वाह मिली जिसका हर किसी को बेसब्री से इंतजार होता है।
बचपन से ही मैं थोड़ा डरपोंक रहा हूं और अपने फैसलों को ज्यादा महत्त्व न देकर दूसरों के विचारों को सहजता से स्वीकार कर अच्छा महसूस करता रहा हूं लेकिन यही मेरी एक बड़ी भूल बन चली थी क्योंकि परिवार में मुझसे कोई भी मशविरा लेना जरुरी ही न समझा गया। यहां तक कि मेरी शादी का फैसला भी मेरे अलावा सभी ने लेना अपना अधिकार समझा। नौकरी के लिए जैसे मैंने अपने आप को बेहद कमजोर पाया उसी तरह इस विषय में भी। अब चुप रहना गलत लगने लगा था सो मैंने अपनी छोटी बहन से कहा कि मैं अभी शादी नहीं करना चाहता और छोटी की शादी के बाद ही अपने बारे में सोचूंगा। ताज्जुब हुआ कि मेरी बात का कोई विरोध ही नहीं हुआ , तो फिर मैं क्यों बेवकूफ की तरह हर मामले में अपनी राय ही न जाहिर करने की गलती इतने सालों से करता रहा ? यहीं तो संस्कारों के नाम पर हम मारे जाते हैं।
पिताजी का असमय देहावसान मुझे बेहद कमजोर और भैया को सब फैसले करने का अधिकार अनायास ही दे गया जिसका कोई भी विरोध मैंने किया ही नहीं। भैया जैसा कहते वैसा ही होता और सिवाय मेरी नौकरी के मैंने कभी कोई कमी भी महसूस न की। अम्मा तो सिर्फ नाम के लिए हां या ना कहतीं थीं और इस बीच लगभग 15 साल गुजर गए और हम सभी पहले की तरह नादान न रहे। लेकिन फिर भी सबकी उम्मीदें वैसी ही हैं जैसी कभी थीं। परिवार की जिम्मेदारियों की ही तरह महत्त्व भी देना जरूरी था जो जरूरी ही न समझ गया , शायद सबकी नज़रों में मैं छोटा ही रह गया। बहन की शादी , फिर मेरी शादी और फिर परिवार में बच्चों का आगमन सब कुछ बदलने लगा था लेकिन अब भी मुझे मेरा अस्तित्व होने का भान ही न था। मेरी पत्नी विभा कभी ताने देती तो थोड़ा दर्द सा होता था जो तुरंत ही गायब भी हो जाता था , और ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार से चलती रही।
मेरे दोनों बेटों को मैंने बिना किसी भेद के पालना चाहा और कुछ विरोध के बाद परिवार से अलग होने का फैसला किया , अपने लिए नहीं विभा और बच्चों के लिए।
मैं मेरी तरह मेरे दोनों बेटों को देखना नहीं चाहता था, बिना रीढ़ के कैसे भला कोई जी सकता है ? तो फिर इतने साल मै कैसे जिया ? क्यों जिया ? क्या मिला ? इज्जत , प्यार या कुछ भी नहीं ? जिसे मैंने इज्जत समझा उसे सबने नाकामी कहा और जिसे मैंने संकोच कहा उसे सबने डर का नाम दिया।
सच तो था न , आज जब सभी अपनी इच्छाओं को महत्व देना बेहतर समझते हैं मैं हमेशा दूसरों को ही बातों को महत्त्व देता रह गया और जिंदगी के हर पड़ाव पर खुद को बहुत पीछे पाया। शिकायत करता भी तो कैसे ? यह तो मेरा अपना स्वभाव था और जिसकी पिताजी ने हमेशा ही बड़ाई की थी। तो क्या मैंने अपने पिताजी के अनुसार खुद को ढाला और उनके बाद खुद को अकेलेपन में खो दिया ? उनके बाद मैंने खुश रहना , अपने लिए कुछ पूछना यहां तक कि खाने पीने में भी एक अजीब सी उदासी से खुद को घिरा पाया मानो मैं अनाथ हो गया और दूसरों की दया पर ही जी रहा हूं। ऐसा किसीने कहा तो नहीं लेकिन मैं ऐसे ही ढल गया।
मेरी दुनियां वीरान थी जिसमे ख़ुशी का नामोनिशान न था। जैसे तैसे पढ़ लिया और नौकरी भी कर ली , शादी के बाद बच्चे भी बड़े हो चले थे। एक दिन अनायास ही मेरे छोटे बेटे ने पूछा, "पापा आप क्यों हमेशा उदास रहते हैं? ,आपको क्या चाहिए? बोलो न, मैं बड़ा होकर लाऊंगा" मेरी आंखें छलछला गयीं। ठीक ऐसा ही तो मैंने भी सोचा था अपने पिताजी के बारे में ! नहीं हरगिज नहीं , मैं अपने बेटे को उसी सांचे में ढलने नहीं दूंगा , हरगिज नहीं ! जैसे मैं गहरी नींद से जागा होऊं।
अक्सर ही परिवारों में ऐसा होता है और उसमे कुछ गलत भी नहीं।
बच्चों को उनके अस्तित्व का भान होने की एक उम्र होती है, जब सभी उनपर ध्यान देते हैं यदि समय रहते उनको ये एहसास प्रबलता से होता हो तो सब सही बन जाता है और नहीं तो फिर कोई उनपर ध्यान ही नहीं देते और हमेशा ही मेरी तरह एक अजीब से एहसास में जिंदगी गुजारने पर मजबूर हो जाते हैं।
मैंने एक संकल्प लिया और पूरी तरह दृढ़ता से उस संकल्प को साकार रूप देने में जुट गया।
आज तकरीबन लगभग मेरी आधी उम्र गुजरने के बाद मुझे अचानक यह अहसास होना सभी के लिए उपहासजनक हो सकता है लेकिन मेरे लिए मेरे अस्तित्व की पहचान की शुरुवात कहना ही उपयुक्त होगा। इतनी दूर सफर तय करने के बाद क्यों ये अजीब सी उथल-पुथल मन को बावला बना रही है ? मैंने अपने मन को झिंझोड़ना चाहा लेकिन मेरा मन तो अतीत में गोते लगा रहा था , सबसे बेखबर , जब मैं 25 का था और जिंदगी का हर पड़ाव बेहद खूबसूरत।
पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने नौकरी करना बेहतर समझा और फिर शुरू हुआ एक अनंत सिलसिला चुनाव का , हर किसी जगह में कोई न कोई नुक्स निकल ही जाता था। यदि मुझे पसंद होता तो भैया मना करते और यदि सबको पसंद होता तो शहर दूर होने से, वहां भेजने की सहमति नहीं मिलती। इसी उधेड़बुन में मैं थोड़ा उदास सा हो चला था। मेरे कई सहपाठी दूसरे शहरों में थे और कई व्यापार करने को उत्सुक नजर आ रहे थे , लेकिन कोई भी मुझ जैसा नहीं था जो न इस तरफ न उस तरफ हो।
आखिरकार मैंने सभी का लिहाज करने से बेहतर फैसला करना समझा और पास ही के शहर में कॉलेज में पढाने का अवसर जाने न दिया , हालांकि थोड़ी नाखुशी महसूस की परिवार से अलग होने में, फिर खुद को समझा लिया। आज मैंने खुद की नज़रों में अपने को एक जिम्मेदार इंसान पाया और एक आत्म तृप्ति महसूस की। दिन सप्ताह और सप्ताह महीने में बदले और मेरी पहली तनख्वाह मिली जिसका हर किसी को बेसब्री से इंतजार होता है।
बचपन से ही मैं थोड़ा डरपोंक रहा हूं और अपने फैसलों को ज्यादा महत्त्व न देकर दूसरों के विचारों को सहजता से स्वीकार कर अच्छा महसूस करता रहा हूं लेकिन यही मेरी एक बड़ी भूल बन चली थी क्योंकि परिवार में मुझसे कोई भी मशविरा लेना जरुरी ही न समझा गया। यहां तक कि मेरी शादी का फैसला भी मेरे अलावा सभी ने लेना अपना अधिकार समझा। नौकरी के लिए जैसे मैंने अपने आप को बेहद कमजोर पाया उसी तरह इस विषय में भी। अब चुप रहना गलत लगने लगा था सो मैंने अपनी छोटी बहन से कहा कि मैं अभी शादी नहीं करना चाहता और छोटी की शादी के बाद ही अपने बारे में सोचूंगा। ताज्जुब हुआ कि मेरी बात का कोई विरोध ही नहीं हुआ , तो फिर मैं क्यों बेवकूफ की तरह हर मामले में अपनी राय ही न जाहिर करने की गलती इतने सालों से करता रहा ? यहीं तो संस्कारों के नाम पर हम मारे जाते हैं।
पिताजी का असमय देहावसान मुझे बेहद कमजोर और भैया को सब फैसले करने का अधिकार अनायास ही दे गया जिसका कोई भी विरोध मैंने किया ही नहीं। भैया जैसा कहते वैसा ही होता और सिवाय मेरी नौकरी के मैंने कभी कोई कमी भी महसूस न की। अम्मा तो सिर्फ नाम के लिए हां या ना कहतीं थीं और इस बीच लगभग 15 साल गुजर गए और हम सभी पहले की तरह नादान न रहे। लेकिन फिर भी सबकी उम्मीदें वैसी ही हैं जैसी कभी थीं। परिवार की जिम्मेदारियों की ही तरह महत्त्व भी देना जरूरी था जो जरूरी ही न समझ गया , शायद सबकी नज़रों में मैं छोटा ही रह गया। बहन की शादी , फिर मेरी शादी और फिर परिवार में बच्चों का आगमन सब कुछ बदलने लगा था लेकिन अब भी मुझे मेरा अस्तित्व होने का भान ही न था। मेरी पत्नी विभा कभी ताने देती तो थोड़ा दर्द सा होता था जो तुरंत ही गायब भी हो जाता था , और ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार से चलती रही।
मेरे दोनों बेटों को मैंने बिना किसी भेद के पालना चाहा और कुछ विरोध के बाद परिवार से अलग होने का फैसला किया , अपने लिए नहीं विभा और बच्चों के लिए।
मैं मेरी तरह मेरे दोनों बेटों को देखना नहीं चाहता था, बिना रीढ़ के कैसे भला कोई जी सकता है ? तो फिर इतने साल मै कैसे जिया ? क्यों जिया ? क्या मिला ? इज्जत , प्यार या कुछ भी नहीं ? जिसे मैंने इज्जत समझा उसे सबने नाकामी कहा और जिसे मैंने संकोच कहा उसे सबने डर का नाम दिया।
सच तो था न , आज जब सभी अपनी इच्छाओं को महत्व देना बेहतर समझते हैं मैं हमेशा दूसरों को ही बातों को महत्त्व देता रह गया और जिंदगी के हर पड़ाव पर खुद को बहुत पीछे पाया। शिकायत करता भी तो कैसे ? यह तो मेरा अपना स्वभाव था और जिसकी पिताजी ने हमेशा ही बड़ाई की थी। तो क्या मैंने अपने पिताजी के अनुसार खुद को ढाला और उनके बाद खुद को अकेलेपन में खो दिया ? उनके बाद मैंने खुश रहना , अपने लिए कुछ पूछना यहां तक कि खाने पीने में भी एक अजीब सी उदासी से खुद को घिरा पाया मानो मैं अनाथ हो गया और दूसरों की दया पर ही जी रहा हूं। ऐसा किसीने कहा तो नहीं लेकिन मैं ऐसे ही ढल गया।
मेरी दुनियां वीरान थी जिसमे ख़ुशी का नामोनिशान न था। जैसे तैसे पढ़ लिया और नौकरी भी कर ली , शादी के बाद बच्चे भी बड़े हो चले थे। एक दिन अनायास ही मेरे छोटे बेटे ने पूछा, "पापा आप क्यों हमेशा उदास रहते हैं? ,आपको क्या चाहिए? बोलो न, मैं बड़ा होकर लाऊंगा" मेरी आंखें छलछला गयीं। ठीक ऐसा ही तो मैंने भी सोचा था अपने पिताजी के बारे में ! नहीं हरगिज नहीं , मैं अपने बेटे को उसी सांचे में ढलने नहीं दूंगा , हरगिज नहीं ! जैसे मैं गहरी नींद से जागा होऊं।
अक्सर ही परिवारों में ऐसा होता है और उसमे कुछ गलत भी नहीं।
बच्चों को उनके अस्तित्व का भान होने की एक उम्र होती है, जब सभी उनपर ध्यान देते हैं यदि समय रहते उनको ये एहसास प्रबलता से होता हो तो सब सही बन जाता है और नहीं तो फिर कोई उनपर ध्यान ही नहीं देते और हमेशा ही मेरी तरह एक अजीब से एहसास में जिंदगी गुजारने पर मजबूर हो जाते हैं।
मैंने एक संकल्प लिया और पूरी तरह दृढ़ता से उस संकल्प को साकार रूप देने में जुट गया।
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