बच्चे मन के सच्चे होते हैं लेकिन बचपन में जिन अनुभवों से ये मासूम गुजरते हैं उनका मानसिक प्रभाव बहुत ही गहरा होता है और अधिकतर परिवारों में साधारणत: इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। जब ध्यान जाता भी है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। मैंने लगभग २० परिवारों को बहुत करीबी से देखा है , लेकिन उनके आर्थिक स्तर में फर्क होने के अतिरिक्त दूसरा कोई भी फर्क मुझे नजर नहीं आया। जिनके बच्चे नहीं होते वो हर प्रयास करने को तैयार होते हैं लेकिन जिनको बिना किसी परेशानी के बच्चे होते हैं उनको बच्चों का सही पालन-पोषण करना ही नहीं आता। मध्य वर्गीय परिवारों में अक्सर बच्चे अभिशप्त होते हैं। न तो वे हर तरह की सुख सुविधाओं में पलते हैं और न ही अभाव में। उनके मन में अनगिनत सपनों का संसार होता है जो एक सपना ही रह जाता है। उनकी आंखे कभी ख़ुशी से चमकती ही नहीं।
यदि उनके इन छोटे-छोटे सपनों को पूरा करने का झूठा आश्वासन मिले तो वे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं और यहीं से शुरू होता है गलतियों का एक अनंत सिलसिला जो धीरे धीरे अपने पांव कहीं गहरे तक जमा लेता है और जिसके तहत कई जिंदगियां बर्बाद हो जातीँ हैं। काश, हम जान पाते इन बच्चों के मन में सपनों की वीरान दुनियां कितनी सुन्दर होती है !!
बच्चों को पालना सिर्फ खाना देने और कपडे देने से कहीं ज्यादा होता है यह अधिकांश लोग भूल जाते हैं। सबसे पहले हर एक मां-पिता को अपने बच्चों का बेहतरीन दोस्त होना चाहिये। बच्चों की छोटी सी दुनियां में मां और पिता का स्थान ऊंचा होना चाहिये लेकिन हम तो उनको जितना हो सके दूर ही रखते हैं कि बच्चे सिर न चढें। जब हम उनसे इतनी दूरी बनायेंगे तो कैसे अपने मन की परेशानियां हमें बतायेंगे ?
मैंने जहां तक गौर किया है परिवारों में बच्चों को मार-पीट कर , डरा-धमका कर रखना ही उचित माना जाता है लेकिन ये तो बेहूदा तरीका है क्योंकि जो अपने मां-पिता को देखने से ही डरेंगे वो कैसे अपनी परेशानियां उनसे बताने की हिम्मत करेंगे ? फिर कौन सुलझाएगा उनकी परेशानियों को ?
एक बच्चे को अच्छे बुरे का ज्ञान होने की कोई पक्की उम्र नहीं होती लेकिन उनकी बातों को अहमियत देने की उम्र पक्की होती है। जब वे कमाने लगें तो उनकी बात को सुना जाता है और दुर्भाग्यवश यदि वो कमाने का अवसर नहीं पाते तो उनकी कोई अहमियत ही नहीं होती। अब सोचिये यदि घर में कोई उनकी बात ही न सुने तो वो क्या करेंगे ? जो उनको अहमियत देंगे वहीँ वो जायेंगे और खुदा न खास्ता यदि जगह गलत हो तो फिर कहने को कुछ रहा ही नहीं। बच्चे गलत और सही का भेद नहीं जानते लेकिन प्यार और नफरत का भेद बहुत ही जल्दी जान जाते हैं!!
पहले परिवार और मन दोनों ही बड़े होते थे लेकिन देखा-देखी में हम न घर के रहे न घाट के। परिवारों में सही सलाह देने के लिए समय और व्यक्ति ही नहीं रहते। रही सही कसर फिल्म पूरी कर देतीं हैं। दुनियां की सारी बातें बच्चे फिल्म से सीखते हैं। अपराध तो सच कहें तो कोई जानकर नहीं करते लेकिन यदि भूले भटके कोई गलती हो भी गयी तो उसे छिपाने का सिलसिला लगातार चलते ही रहता है।
मेरे मन में अक्सर यह सवाल आता है कि मासूम बच्चे जो गुनहगार बन जाते हैं समाज के चंद शरीफजादोँ के कारण , उनको सजा क्यों नहीं होती ? एक मासूम को बेवजह गुनहगार बनाया जाता है सिर्फ खाना देकर। हमसे तो बेहतर होते हैं रईसों के घरों में पलते विदेशी नस्ल के कुत्ते , कम से कम उनके खाने पीने का अच्छा ख्याल तो रखा जाता है , इंसान तो जो गरीबी में पलते हैं कुत्तों से भी बदतर बना दिए जाते हैं।
अक्सर गरीब बच्चों को छोटे-मोटे कामों के लिए रखना साधारण बात होती है लेकिन उन मासूम निगाहों से कुछ भी छिपाया नहीं जाता और सब कुछ सीखने का दुर्लभ मौका उनको बहुत ही आसानी से उपलब्ध किया जाता है। यदि इन गलीच जगहों से वो बच सके तो उनका भाग्य, वरना ज्यादातर यहीं से शुरू होता है बीजारोपण एक अबोध मन में जिसको दुनिया की कोई भी ताकत नहीं बदल सकती और सही मौका मिलते ही बीज बड़ा वृक्ष बन जाता है। हम कहानियों और फिल्म में हर बात समझ जाते हैं लेकिन यथार्थ में हमारी आंखों को कुछ नजर ही नहीं आता। कितने ही उम्दा स्तर की फिल्म हम देखते हैं लेकिन जिंदगी में हमें सच्चाई निगलना तो दूर देखना ही नागवार होता है।
छोटे-छोटे बच्चों की खरीद-फरोख्त आम बात है बड़े-बड़े शहरों में , लेकिन उनपर पर्दा डाल दिया जाता है ताकि कानोकान खबर न हो। इज्जत भी बड़ी अजीब चीज है , उसको बचाने के चक्कर में हम सब कुछ भूल जाते हैं।
अपने बच्चे , परिवार , जिंदगी का मकसद , आपसी रिश्ते और समाज में अपनी जगह , मेरी नजर में ये सब नकली है लेकिन किसी की हिम्मत नहीं होती इन अनदेखे-अनसुने कानूनों को अनदेखा करने की !!
अनगिनत परिवारों में बच्चे थोड़े समझदार होते ही अपनी अलग दुनियां में मशगूल हो जाते हैं। मां -पिता से रिश्ता रखना ही नहीं चाहते क्योंकि बचपन में उनकी बातों को महत्त्व नहीं दिया गया और इस छोटी सी गलती
की सजा वो अपने मां-पिता को देने के लिए हर कुछ करने को तैयार होते हैं , चाहे वो गलत काम ही क्यों न हो!! सिवाय आंसू भरी आंखो के कुछ दिखता ही नहीं। बड़ी मुश्किलों से बच्चों को बड़ा करने के पश्चात खोना कितना दुखदायी होता है ये तो हम जानते हैं लेकिन अपने बीच की छोटी सी दूरी कम करने का प्रयास करने में अपनी तौहीन समझकर अपना सपनों का संसार उजड़ने देखकर आंसू बहाने वाले अनगिनत लोगों को कैसे समझाएं पता नहीं!!
मैं शाम में अपना समय व्यतीत करने और थोड़ी बहुत सहायता करने के उद्देश्य से घर में क्लास लेती हूं। मेरे पास बच्चों से लेकर मेरे हमउम्र और कभी-कभी ज्यादा उम्र वाले लोग भी आते हैं। 6 महीने के छोटे से अवकाश में वे मुझसे अपनी परेशानियां बांटने की हद तक करीब आ जाते हैं। मैं अक्सर यह सोचकर आश्चर्य करती हूं कि मन में इतना भार उठाये ये जवान युवक कैसे खुश रहेंगे और इनको खुश रखना कितना आसान है , क्यों इनके परिवार से इनको ये अलगाव मेरे पास लाता है ? थोड़ा सा समय ही मैं उनको देती हूं लेकिन इसके अभाव में कितने ही युवक गलत दिशा में भटकते हैं , कौन दोषी है बच्चे या परिवार ?
एक हद तक बच्चे अपनी सारी परेशानियां घर में बता कर हल्का महसूस करते हैं लेकिन वहीं थोड़े बड़े होने के बाद नहीं करते क्योंकि एक छोटी सी दूरी हमारे बीच आ जाती है जो हम जानकार होते हुए भी अनजान बनकर अनदेखा करते हैं और यह दूरी हमारी सारी खुशियां निगल जाती है। मेरा हर मां-पिता से ये अनुरोध है कि अपने बच्चों से दोस्तों की तरह रहना सीखें ताकि बच्चे भी खुश रह सकें और हम भी , आखिर उनको भी दूसरे मां -पिता नहीं मिलेंगे और हमें भी बच्चे , फिर क्यों ये खींचातानी ? अनगिनत युवक गलत आदतों के शिकार हो जीवन विषमय बना लेतें हैं और लड़कियां गलत जीवन साथी चुनकर पछतातीं हैं लेकिन उसकी जड़ में सिर्फ थोड़ा सा प्यार ही होता है।
मैंने लोगों को मन्नत मांगते देखा है बच्चों के लिये और अनाथ बच्चों को रोते देखा है मां और पिता के प्यार के लिये ठीक उसी तरह सब कुछ होते हुये बेबस परिवारों को भी देखा है। मेरा मन तरस खाता है उनपर क्यों ये इनके पास इतनी सम्पदा होते इतने गरीब हैं ? लेकिन सच तो ये है की इनका मन नीचे उतरना ही नहीं चाहता और दूर से हर चीज सुन्दर लगती है!!
जिन परिवारों में पैसों का अभाव होता है वो पैसों को महत्त्व देकर बाकी बहुत सारी चीजों को नज़र अंदाज़ कर देते हैं और जो पैसों की कमी देखे बिना पलते हैं वो रिश्तों को ज्यादा अहमियत देते हैं। ज्यादातर मध्य वर्गीय परिवारों में बच्चे थोड़ी खींचा-तानी में ही पलते हैं लेकिन यदि अच्छी जगह नौकरी मिल गयी तो बहुतायत परिवारों में मां-पिता को बोझ समझने की प्रवृत्ति दिखाई देती है जो मुझे हरगिज़ ठीक नहीं लगती। मेरे विचार में बच्चों को दूसरे माता -पिता और माता -पिता को दूसरे बच्चे मिलना नामुमकिन है फिर क्यों रिश्तों को ख़त्म करने जैसा व्यवहार करें ? कोई भी शुभ-दिन बिना याद में आंसू बहाये बीत ही नहीं सकता फिर क्यों ये अकड़ जो रिश्तों को खोखली कर दे ?
आजकल तो ये छोटे परिवारों का चलन रिश्तों का दुश्मन है उसपर रही सही कसर हमारी बेवकूफियां पूरी कर देतीं हैं। रिश्तों के होते रिश्तों के बिना रहने से रिश्तों के बिना रहना ही बेहतरीन होगा। आजकल तो अधिकांश परिवारों में सिर्फ एक ही बच्चा देखना आम हो गया। मामा , मौसी , मामी , मौसाजी जैसे रिश्तों की महक से अनजान ये मासूम बच्चे विदेशों में पलने का भाग्य होते हुए भी बद-नसीब ही होंगे क्योंकि प्यार से रोटी सब्जी खिलाने वाली नानीमा से उनका वास्ता ही न होगा। गर्मियों में धूप की परवाह किये बिना चोरी-छिपे खेलने का मजा तो वो जान ही नहीं सकते। इमली , अमरुद , बेर , आम , कटहल खाने का मजा उनको मालूम ही न होगा लेकिन उनको ये कमी महसूस भी न होगी क्योंकि रिश्तों की खुशबू से अनजान ही उनका बचपन बीतेगा।
आज भी नानाजी और नानीमा की याद दिल में एक हूक सी उठाती है लेकिन खुशी है कि हमने इतना निश्छल प्यार पाया जो अब ढूंढेंगे तो भी न मिलेगा। प्यार की परिभाषाएं बिलकुल ही बदल चुकीं हैं। हम ही बेवकूफों की तरह रेगिस्तान में पानी ढूंढ रहें हैं शायद। भूले न जा सकेंगे वो बचपन के दिन , धूप में मुर्गा बनाने वाले मामाजी, बच्चों के आपसी लड़ाई-झगड़े चुटकियों में सुलझाने वाली और जल्दी-जल्दी गरम और स्वादिष्ट खाना खिलाने वाली नानीमा , हर चीज में मजा लेने वाले नानाजी , हम सबको बैठाकर मजेदार कहानियां सुनाने वाले मामाजी जो हमेशा ही हमारे दिलों और दिमाग पर अपना असर छोड़ गए और जिनसे हमने ग़ज़ल सुनना, समझना सीखा , हम भाई और बहनों की फ़ौज जो हर गर्मी की छुट्टियों का इंतजार करतीं थीं और जिनकी अब सिर्फ यादें हीं हैं , समय तो पंख लगाये उड़ गया।मामाजी की याद आते ही खुद ब खुद आंखें नम हो जातीं हैं। मेरे बचपन की यादों में मामाजी और नानीमा , नानाजी का ही आधिपत्य है। हम लगभग सालाना एक बार मिलते ही थे। विपिन मामाजी की यादें ज्यादा हैं शायद इसलिए कि उन्होंने हमारे साथ ज्यादा समय बिताया। छोटी-छोटी बातें भी हमने उनसे सीखीं। हम दोनों बहनो को चलते समय कैसे घुटने आपस में रगड़े बिना चलने से लेकर छोटी-छोटी कई बातें उन्होंने सिखाईं जो इतना जमाना गुजरने के बाद भी मन में तरोताजा हैं।
इंसान का मन भी एक अजीब होता है , जब पास हो तो अपनी भावनाओं को छिपाता है और दूर होने पर साथ के लिये तरसता है। जब अपने बच्चों को देखते हैं तो एहसास होता है गुजरे समय का। आज भी वो सदाबहार ग़ज़ल कानों में गूंजती है. .... ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो , भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी , मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन , वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी …काश !! ऐसा हो पाता।
यदि उनके इन छोटे-छोटे सपनों को पूरा करने का झूठा आश्वासन मिले तो वे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं और यहीं से शुरू होता है गलतियों का एक अनंत सिलसिला जो धीरे धीरे अपने पांव कहीं गहरे तक जमा लेता है और जिसके तहत कई जिंदगियां बर्बाद हो जातीँ हैं। काश, हम जान पाते इन बच्चों के मन में सपनों की वीरान दुनियां कितनी सुन्दर होती है !!
बच्चों को पालना सिर्फ खाना देने और कपडे देने से कहीं ज्यादा होता है यह अधिकांश लोग भूल जाते हैं। सबसे पहले हर एक मां-पिता को अपने बच्चों का बेहतरीन दोस्त होना चाहिये। बच्चों की छोटी सी दुनियां में मां और पिता का स्थान ऊंचा होना चाहिये लेकिन हम तो उनको जितना हो सके दूर ही रखते हैं कि बच्चे सिर न चढें। जब हम उनसे इतनी दूरी बनायेंगे तो कैसे अपने मन की परेशानियां हमें बतायेंगे ?
मैंने जहां तक गौर किया है परिवारों में बच्चों को मार-पीट कर , डरा-धमका कर रखना ही उचित माना जाता है लेकिन ये तो बेहूदा तरीका है क्योंकि जो अपने मां-पिता को देखने से ही डरेंगे वो कैसे अपनी परेशानियां उनसे बताने की हिम्मत करेंगे ? फिर कौन सुलझाएगा उनकी परेशानियों को ?
एक बच्चे को अच्छे बुरे का ज्ञान होने की कोई पक्की उम्र नहीं होती लेकिन उनकी बातों को अहमियत देने की उम्र पक्की होती है। जब वे कमाने लगें तो उनकी बात को सुना जाता है और दुर्भाग्यवश यदि वो कमाने का अवसर नहीं पाते तो उनकी कोई अहमियत ही नहीं होती। अब सोचिये यदि घर में कोई उनकी बात ही न सुने तो वो क्या करेंगे ? जो उनको अहमियत देंगे वहीँ वो जायेंगे और खुदा न खास्ता यदि जगह गलत हो तो फिर कहने को कुछ रहा ही नहीं। बच्चे गलत और सही का भेद नहीं जानते लेकिन प्यार और नफरत का भेद बहुत ही जल्दी जान जाते हैं!!
पहले परिवार और मन दोनों ही बड़े होते थे लेकिन देखा-देखी में हम न घर के रहे न घाट के। परिवारों में सही सलाह देने के लिए समय और व्यक्ति ही नहीं रहते। रही सही कसर फिल्म पूरी कर देतीं हैं। दुनियां की सारी बातें बच्चे फिल्म से सीखते हैं। अपराध तो सच कहें तो कोई जानकर नहीं करते लेकिन यदि भूले भटके कोई गलती हो भी गयी तो उसे छिपाने का सिलसिला लगातार चलते ही रहता है।
मेरे मन में अक्सर यह सवाल आता है कि मासूम बच्चे जो गुनहगार बन जाते हैं समाज के चंद शरीफजादोँ के कारण , उनको सजा क्यों नहीं होती ? एक मासूम को बेवजह गुनहगार बनाया जाता है सिर्फ खाना देकर। हमसे तो बेहतर होते हैं रईसों के घरों में पलते विदेशी नस्ल के कुत्ते , कम से कम उनके खाने पीने का अच्छा ख्याल तो रखा जाता है , इंसान तो जो गरीबी में पलते हैं कुत्तों से भी बदतर बना दिए जाते हैं।
अक्सर गरीब बच्चों को छोटे-मोटे कामों के लिए रखना साधारण बात होती है लेकिन उन मासूम निगाहों से कुछ भी छिपाया नहीं जाता और सब कुछ सीखने का दुर्लभ मौका उनको बहुत ही आसानी से उपलब्ध किया जाता है। यदि इन गलीच जगहों से वो बच सके तो उनका भाग्य, वरना ज्यादातर यहीं से शुरू होता है बीजारोपण एक अबोध मन में जिसको दुनिया की कोई भी ताकत नहीं बदल सकती और सही मौका मिलते ही बीज बड़ा वृक्ष बन जाता है। हम कहानियों और फिल्म में हर बात समझ जाते हैं लेकिन यथार्थ में हमारी आंखों को कुछ नजर ही नहीं आता। कितने ही उम्दा स्तर की फिल्म हम देखते हैं लेकिन जिंदगी में हमें सच्चाई निगलना तो दूर देखना ही नागवार होता है।
छोटे-छोटे बच्चों की खरीद-फरोख्त आम बात है बड़े-बड़े शहरों में , लेकिन उनपर पर्दा डाल दिया जाता है ताकि कानोकान खबर न हो। इज्जत भी बड़ी अजीब चीज है , उसको बचाने के चक्कर में हम सब कुछ भूल जाते हैं।
अपने बच्चे , परिवार , जिंदगी का मकसद , आपसी रिश्ते और समाज में अपनी जगह , मेरी नजर में ये सब नकली है लेकिन किसी की हिम्मत नहीं होती इन अनदेखे-अनसुने कानूनों को अनदेखा करने की !!
अनगिनत परिवारों में बच्चे थोड़े समझदार होते ही अपनी अलग दुनियां में मशगूल हो जाते हैं। मां -पिता से रिश्ता रखना ही नहीं चाहते क्योंकि बचपन में उनकी बातों को महत्त्व नहीं दिया गया और इस छोटी सी गलती
की सजा वो अपने मां-पिता को देने के लिए हर कुछ करने को तैयार होते हैं , चाहे वो गलत काम ही क्यों न हो!! सिवाय आंसू भरी आंखो के कुछ दिखता ही नहीं। बड़ी मुश्किलों से बच्चों को बड़ा करने के पश्चात खोना कितना दुखदायी होता है ये तो हम जानते हैं लेकिन अपने बीच की छोटी सी दूरी कम करने का प्रयास करने में अपनी तौहीन समझकर अपना सपनों का संसार उजड़ने देखकर आंसू बहाने वाले अनगिनत लोगों को कैसे समझाएं पता नहीं!!
मैं शाम में अपना समय व्यतीत करने और थोड़ी बहुत सहायता करने के उद्देश्य से घर में क्लास लेती हूं। मेरे पास बच्चों से लेकर मेरे हमउम्र और कभी-कभी ज्यादा उम्र वाले लोग भी आते हैं। 6 महीने के छोटे से अवकाश में वे मुझसे अपनी परेशानियां बांटने की हद तक करीब आ जाते हैं। मैं अक्सर यह सोचकर आश्चर्य करती हूं कि मन में इतना भार उठाये ये जवान युवक कैसे खुश रहेंगे और इनको खुश रखना कितना आसान है , क्यों इनके परिवार से इनको ये अलगाव मेरे पास लाता है ? थोड़ा सा समय ही मैं उनको देती हूं लेकिन इसके अभाव में कितने ही युवक गलत दिशा में भटकते हैं , कौन दोषी है बच्चे या परिवार ?
एक हद तक बच्चे अपनी सारी परेशानियां घर में बता कर हल्का महसूस करते हैं लेकिन वहीं थोड़े बड़े होने के बाद नहीं करते क्योंकि एक छोटी सी दूरी हमारे बीच आ जाती है जो हम जानकार होते हुए भी अनजान बनकर अनदेखा करते हैं और यह दूरी हमारी सारी खुशियां निगल जाती है। मेरा हर मां-पिता से ये अनुरोध है कि अपने बच्चों से दोस्तों की तरह रहना सीखें ताकि बच्चे भी खुश रह सकें और हम भी , आखिर उनको भी दूसरे मां -पिता नहीं मिलेंगे और हमें भी बच्चे , फिर क्यों ये खींचातानी ? अनगिनत युवक गलत आदतों के शिकार हो जीवन विषमय बना लेतें हैं और लड़कियां गलत जीवन साथी चुनकर पछतातीं हैं लेकिन उसकी जड़ में सिर्फ थोड़ा सा प्यार ही होता है।
मैंने लोगों को मन्नत मांगते देखा है बच्चों के लिये और अनाथ बच्चों को रोते देखा है मां और पिता के प्यार के लिये ठीक उसी तरह सब कुछ होते हुये बेबस परिवारों को भी देखा है। मेरा मन तरस खाता है उनपर क्यों ये इनके पास इतनी सम्पदा होते इतने गरीब हैं ? लेकिन सच तो ये है की इनका मन नीचे उतरना ही नहीं चाहता और दूर से हर चीज सुन्दर लगती है!!
जिन परिवारों में पैसों का अभाव होता है वो पैसों को महत्त्व देकर बाकी बहुत सारी चीजों को नज़र अंदाज़ कर देते हैं और जो पैसों की कमी देखे बिना पलते हैं वो रिश्तों को ज्यादा अहमियत देते हैं। ज्यादातर मध्य वर्गीय परिवारों में बच्चे थोड़ी खींचा-तानी में ही पलते हैं लेकिन यदि अच्छी जगह नौकरी मिल गयी तो बहुतायत परिवारों में मां-पिता को बोझ समझने की प्रवृत्ति दिखाई देती है जो मुझे हरगिज़ ठीक नहीं लगती। मेरे विचार में बच्चों को दूसरे माता -पिता और माता -पिता को दूसरे बच्चे मिलना नामुमकिन है फिर क्यों रिश्तों को ख़त्म करने जैसा व्यवहार करें ? कोई भी शुभ-दिन बिना याद में आंसू बहाये बीत ही नहीं सकता फिर क्यों ये अकड़ जो रिश्तों को खोखली कर दे ?
आजकल तो ये छोटे परिवारों का चलन रिश्तों का दुश्मन है उसपर रही सही कसर हमारी बेवकूफियां पूरी कर देतीं हैं। रिश्तों के होते रिश्तों के बिना रहने से रिश्तों के बिना रहना ही बेहतरीन होगा। आजकल तो अधिकांश परिवारों में सिर्फ एक ही बच्चा देखना आम हो गया। मामा , मौसी , मामी , मौसाजी जैसे रिश्तों की महक से अनजान ये मासूम बच्चे विदेशों में पलने का भाग्य होते हुए भी बद-नसीब ही होंगे क्योंकि प्यार से रोटी सब्जी खिलाने वाली नानीमा से उनका वास्ता ही न होगा। गर्मियों में धूप की परवाह किये बिना चोरी-छिपे खेलने का मजा तो वो जान ही नहीं सकते। इमली , अमरुद , बेर , आम , कटहल खाने का मजा उनको मालूम ही न होगा लेकिन उनको ये कमी महसूस भी न होगी क्योंकि रिश्तों की खुशबू से अनजान ही उनका बचपन बीतेगा।
आज भी नानाजी और नानीमा की याद दिल में एक हूक सी उठाती है लेकिन खुशी है कि हमने इतना निश्छल प्यार पाया जो अब ढूंढेंगे तो भी न मिलेगा। प्यार की परिभाषाएं बिलकुल ही बदल चुकीं हैं। हम ही बेवकूफों की तरह रेगिस्तान में पानी ढूंढ रहें हैं शायद। भूले न जा सकेंगे वो बचपन के दिन , धूप में मुर्गा बनाने वाले मामाजी, बच्चों के आपसी लड़ाई-झगड़े चुटकियों में सुलझाने वाली और जल्दी-जल्दी गरम और स्वादिष्ट खाना खिलाने वाली नानीमा , हर चीज में मजा लेने वाले नानाजी , हम सबको बैठाकर मजेदार कहानियां सुनाने वाले मामाजी जो हमेशा ही हमारे दिलों और दिमाग पर अपना असर छोड़ गए और जिनसे हमने ग़ज़ल सुनना, समझना सीखा , हम भाई और बहनों की फ़ौज जो हर गर्मी की छुट्टियों का इंतजार करतीं थीं और जिनकी अब सिर्फ यादें हीं हैं , समय तो पंख लगाये उड़ गया।मामाजी की याद आते ही खुद ब खुद आंखें नम हो जातीं हैं। मेरे बचपन की यादों में मामाजी और नानीमा , नानाजी का ही आधिपत्य है। हम लगभग सालाना एक बार मिलते ही थे। विपिन मामाजी की यादें ज्यादा हैं शायद इसलिए कि उन्होंने हमारे साथ ज्यादा समय बिताया। छोटी-छोटी बातें भी हमने उनसे सीखीं। हम दोनों बहनो को चलते समय कैसे घुटने आपस में रगड़े बिना चलने से लेकर छोटी-छोटी कई बातें उन्होंने सिखाईं जो इतना जमाना गुजरने के बाद भी मन में तरोताजा हैं।
इंसान का मन भी एक अजीब होता है , जब पास हो तो अपनी भावनाओं को छिपाता है और दूर होने पर साथ के लिये तरसता है। जब अपने बच्चों को देखते हैं तो एहसास होता है गुजरे समय का। आज भी वो सदाबहार ग़ज़ल कानों में गूंजती है. .... ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो , भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी , मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन , वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी …काश !! ऐसा हो पाता।
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