हर रिश्ते की एक एहमियत और खुशबू होती है जो प्रायः हमें बिछोह से न केवल विचलित अपितु मृत बना जाती है। लोग कहते हैं समय से बेहतर कोई मरहम नहीं लेकिन यह हर रिश्ते के लिए सही नहीं। कुछ रिश्ते आजन्म हमें अपनी कमी का एहसास दिलाते ही रहते हैं।
मां -पिता , भाई -बहन , पति -पत्नी और लगभग हर रिश्ते में एक मिठास और सुंदरता है जो अन्यत्र दुर्लभ है लेकिन उनकी खुशबू बरक़रार रखने के लिए हमारी तरफ से कितनी कोशिशें करते हैं यह मद्दे नजर रखने काबिल है। बचपन तो दूसरा कोई चारा न होने से साथ बिताना ही पड़ता है लेकिन जब हम पंछी बनकर पंख पसारे दुनिया का चक्कर लगाने के बाद लौटने पर अपनों की याद करते हैं और न मिल पाने की कसक हूक में बदलते देखकर अपनी आंखें बिना किसी के ध्यान में आये पोंछते हैं , तब ही तो पता चलता है वियोग का और रिश्तों की गहराई का। चाहे हम कितना भी दम भर लें दोस्ती का लेकिन जो रिश्ते भगवान बनाता है वो कभी भी कमजोर नहीं होते।
मैं सबसे दूर यहां दक्षिण में आ तो गयी लेकिन जब पापा के दशगात्र में सबसे मिली तो मुझे ही ताज्जुब हुआ क्योंकि मेरी आंखें लगातार बहती ही जा रहीं थीं। मेरे मौसाजी ने जो अब न रहे , मेरा सर सहलाकर कहा , "इतना सारा प्यार मन में छुपाये कैसे नीलू तू वहां रहती है ?" मैं तो सच कैसे जीती हूं समझ न पाई लेकिन एक कमी सी है जो शायद कभी पूरी ही न हो पाएगी। कभी कभार लगता है काश मैं एक पंछी होती !!
लगभग यहां आकर 23 साल हो गए लेकिन आज भी मन में एक कमी महसूस होती है और एक दर्द भी , जिसकी पूर्ति सिर्फ उन रिश्तों से ही हो सकती है , हालांकि यहां मैंने नए रिश्ते बनाये लेकिन फिर भी मन में एक अजीब सा खालीपन अक्सर ही मुझे विचलित करता है। क्या करें, शायद इसे ही किस्मत का खेल कहते हैं !
मैंने दक्षिण में आकर लगातार खुद को कई तरह की सामुदायिक विकास और सुधार की प्रक्रियाओं से जोड़ रखा है और इसमें मैं अपनी कमियों को भूलकर खुश रहने में सफल होती हूं। शहरों की अपेक्षा हम ग्रामों में ज्यादा गहराई से जुड़ने का मौका पाते हैं और एक तृप्ति भी जो जीवन को स्थगित नहीं होने देती। मैंने शायद ही कभी बड़े शहरों में रहना पसंद किया हो , मेरे दोस्त मुझे अक्सर ही झिड़कते थे और मजाक भी उड़ाते थे क्योंकि मैं बेहद ही सादगी से रहती थी और अब तक वैसी ही हूं जैसी थी , लेकिन मैं इसे एक अच्छी बात समझती हूं कि मैं एक बिलकुल ही नए परिवेश में रहने में सफल हो सकी।
मां -पिता , भाई -बहन , पति -पत्नी और लगभग हर रिश्ते में एक मिठास और सुंदरता है जो अन्यत्र दुर्लभ है लेकिन उनकी खुशबू बरक़रार रखने के लिए हमारी तरफ से कितनी कोशिशें करते हैं यह मद्दे नजर रखने काबिल है। बचपन तो दूसरा कोई चारा न होने से साथ बिताना ही पड़ता है लेकिन जब हम पंछी बनकर पंख पसारे दुनिया का चक्कर लगाने के बाद लौटने पर अपनों की याद करते हैं और न मिल पाने की कसक हूक में बदलते देखकर अपनी आंखें बिना किसी के ध्यान में आये पोंछते हैं , तब ही तो पता चलता है वियोग का और रिश्तों की गहराई का। चाहे हम कितना भी दम भर लें दोस्ती का लेकिन जो रिश्ते भगवान बनाता है वो कभी भी कमजोर नहीं होते।
मैं सबसे दूर यहां दक्षिण में आ तो गयी लेकिन जब पापा के दशगात्र में सबसे मिली तो मुझे ही ताज्जुब हुआ क्योंकि मेरी आंखें लगातार बहती ही जा रहीं थीं। मेरे मौसाजी ने जो अब न रहे , मेरा सर सहलाकर कहा , "इतना सारा प्यार मन में छुपाये कैसे नीलू तू वहां रहती है ?" मैं तो सच कैसे जीती हूं समझ न पाई लेकिन एक कमी सी है जो शायद कभी पूरी ही न हो पाएगी। कभी कभार लगता है काश मैं एक पंछी होती !!
लगभग यहां आकर 23 साल हो गए लेकिन आज भी मन में एक कमी महसूस होती है और एक दर्द भी , जिसकी पूर्ति सिर्फ उन रिश्तों से ही हो सकती है , हालांकि यहां मैंने नए रिश्ते बनाये लेकिन फिर भी मन में एक अजीब सा खालीपन अक्सर ही मुझे विचलित करता है। क्या करें, शायद इसे ही किस्मत का खेल कहते हैं !
मैंने दक्षिण में आकर लगातार खुद को कई तरह की सामुदायिक विकास और सुधार की प्रक्रियाओं से जोड़ रखा है और इसमें मैं अपनी कमियों को भूलकर खुश रहने में सफल होती हूं। शहरों की अपेक्षा हम ग्रामों में ज्यादा गहराई से जुड़ने का मौका पाते हैं और एक तृप्ति भी जो जीवन को स्थगित नहीं होने देती। मैंने शायद ही कभी बड़े शहरों में रहना पसंद किया हो , मेरे दोस्त मुझे अक्सर ही झिड़कते थे और मजाक भी उड़ाते थे क्योंकि मैं बेहद ही सादगी से रहती थी और अब तक वैसी ही हूं जैसी थी , लेकिन मैं इसे एक अच्छी बात समझती हूं कि मैं एक बिलकुल ही नए परिवेश में रहने में सफल हो सकी।
No comments:
Post a Comment