Monday, September 28, 2015

प्रगति कितनी सच और कितनी नकली

जहां तक मेरी याद जाती है हमारा देश स्त्रियों का पूरी तरह से सम्मान और सुरक्षा देने के लिए प्रसिद्ध रहा है। विदेशियों के आगमन से पहले हर तरह से प्रगतिशील रहे हम बीच के कुछ वर्षों में अपनी पहचान पूरी तरह से खो बैठे और गुलामी ही हमारी कमजोरी बन गयी। हमारा विकास अधूरा ही रहेगा जब तक हम नारियों को उनके अधिकारों से वंचित करेंगे। इतिहास गवाह है हमारे देश की नारियों के धैर्य और असाधारण क्षमताओं का लेकिन आज हम स्वाभाविकता से नारियों का अपमान करने में एक सुख और गर्व का अनुभव करते हैं। जब हमारे परिवार या किसी अन्य नारी अपनी आँखों के सामने अपमानित होते देखते हैं तो हमारी दबी अनुभूतियाँ ऊपर आकर उनकी रक्षा के लिए आतुर हो, हम खुद को अपने स्वाभाविक रूप से अलग पाते हैं। इसका मतलब साफ़ ज़ाहिर है कि हमारे अंतर्मन में कहीं  गहरे हमारे संस्कार अपनी जड़ जमाये हैं लेकिन अपने स्वार्थ की वजह से हम उनका परित्याग करने में नहीं हिचकते, क्यों ? बेटियों का अच्छी जगह विवाह करने की इच्छा हर एक पिता की होती है लेकिन पत्नी को हम क्यों उसके अधिकारों से वंचित करने में सुख ढूंढते हैं ? हम बिना किसी झिझक के क्यों ऐसा व्यवहार करते हैं, शायद अपने नपुंसक मन को एक झूठी तृप्ति देने के लिए लेकिन इसके घातक परिणाम झेलने के लिए न ही हमारे मन में ताकत है और न ही इच्छा।

जब हम पूरी तरह से खान पान और रहन सहन में विदेशियों की तरह रहने में खुशी पाते हैं तो क्यों हम उनकी ही तरह अपने परिवार की स्त्रियों को स्वतंत्रता और इज़्ज़त नहीं दे पाते ? हमारा नजरिया इकतरफा हो चुका है और दिमाग शिथिल। किसी भी ज़माने में हमने महिलाओं को अपमानित होने नहीं दिया लेकिन अब तो जान लेने में भी हिचकते नहीं क्योंकि हमारा मानसिक स्तर गिर चुका है और हम इसमें अपनी शान समझने लगे हैं। 

किसी भी ज़माने में स्त्रियां कमजोर नहीं रहीं ,  हमने उनको परिवार का वास्ता देकर घर की चहारदीवारों में कैद करके एक आत्मतृप्ति महसूस की , स्त्रियों ने अपना कर्तव्य खुशी खुशी  निभाया और हर एक परिस्थिति में अपने परिवार को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार किया , क्या यह उनके त्याग और सहनशीलता का उदाहरण नहीं? हमें हर एक मुश्किल में पूरे मन से साथ देकर हमारे हौसले बढ़ाये, जब भी मन से हमने निरुत्साहित महसूस किया, उम्मीद की एक किरण बनकर बेटी, बहन, दोस्त, पत्नी, मां, भाभी हर रूप में हमारा साथ दिया। हमारी प्रेरणा स्त्रोत्र को हम इतनी आसानी से कुचलने में नहीं हिचकते , कैसे हमारा मन हमारा साथ इस तुच्छ और घृणित नज़रिये को व्यवहार में लाने की अनुमति देता है? 

हमारे देश में लक्ष्मीबाई , विजयलक्ष्मी पंडित , गार्गी , इंदिरा गांधी , किरण बेदी , कल्पना चावला, मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी , सोनिया गांधी , मदर टेरेसा , सरोजिनी नायडू जैसी वीर और जुझारू स्त्रियों की कमी नहीं लेकिन हमारा नजरिया ठीक नहीं। हम तो बेहिचक बेटियों की संख्या कम करने में अपनी इज़्ज़त समझने लगे हैं। कल को हमारा नाम रौशन करने के लिए बेटियां ही नहीं होंगी!! सोचिये और अपने बदलते नज़रिये को सुधारिये , हर इंसान अपनी माँ और बहिन से प्यार करता है तो फिर खुद की ज़िन्दगी संवारने वाली पत्नी और खुशियां बिखेरने वाली बेटियों के लिए क्यों हम अनजाने ही अपना नजरिया संकीर्ण होने दें ?  भारतीय संस्कृति अपनी अलग पहचान रखती है और अपनी मातृभूमि की खुशबू हमें बरक़रार रखनी ही होगी....

बच्चे मन के सच्चे

बच्चे मन के सच्चे होते हैं लेकिन बचपन में जिन अनुभवों से ये मासूम गुजरते हैं उनका मानसिक प्रभाव बहुत ही गहरा होता है और अधिकतर परिवारों में साधारणत: इस पर ध्यान नहीं दिया जाता।  जब ध्यान जाता भी है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।  मैंने लगभग २० परिवारों को बहुत करीबी से देखा है , लेकिन उनके आर्थिक स्तर में फर्क होने के अतिरिक्त दूसरा कोई भी फर्क मुझे नजर नहीं आया।  जिनके बच्चे नहीं होते वो हर प्रयास करने को तैयार होते हैं लेकिन जिनको बिना किसी परेशानी के बच्चे होते हैं उनको बच्चों का सही पालन-पोषण करना ही नहीं आता। मध्य वर्गीय परिवारों में अक्सर बच्चे अभिशप्त होते हैं।  न तो वे हर तरह की सुख सुविधाओं में पलते हैं और न ही अभाव में।  उनके मन में अनगिनत सपनों का संसार होता है जो एक सपना ही रह जाता है। उनकी आंखे कभी ख़ुशी से चमकती ही नहीं।

यदि उनके इन छोटे-छोटे सपनों को पूरा करने का झूठा आश्वासन मिले तो वे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं और यहीं से शुरू होता है गलतियों का एक अनंत सिलसिला जो धीरे धीरे अपने पांव कहीं गहरे तक जमा लेता है और जिसके तहत कई जिंदगियां बर्बाद हो जातीँ हैं। काश, हम जान पाते इन बच्चों के मन में सपनों की वीरान दुनियां कितनी सुन्दर होती है !!

बच्चों को पालना सिर्फ खाना देने और कपडे देने से कहीं ज्यादा होता है यह अधिकांश लोग भूल जाते हैं।  सबसे पहले हर एक  मां-पिता को अपने बच्चों का बेहतरीन दोस्त होना चाहिये। बच्चों की छोटी सी दुनियां में मां और पिता का स्थान ऊंचा होना चाहिये लेकिन हम तो उनको जितना हो सके दूर ही रखते हैं कि बच्चे सिर न चढें।  जब हम उनसे इतनी दूरी बनायेंगे तो कैसे अपने मन की परेशानियां हमें बतायेंगे ?

मैंने जहां तक गौर किया है परिवारों में बच्चों को मार-पीट कर , डरा-धमका कर रखना ही उचित माना जाता है लेकिन ये तो बेहूदा तरीका है क्योंकि जो अपने मां-पिता को देखने से ही डरेंगे वो कैसे अपनी परेशानियां उनसे बताने की हिम्मत करेंगे ? फिर कौन सुलझाएगा उनकी परेशानियों को ?

एक बच्चे को अच्छे बुरे का ज्ञान होने की कोई पक्की उम्र नहीं होती लेकिन उनकी बातों को अहमियत देने की उम्र पक्की होती है।  जब वे कमाने लगें तो उनकी बात को सुना जाता है और दुर्भाग्यवश यदि वो कमाने का अवसर नहीं पाते तो उनकी कोई अहमियत ही नहीं होती।  अब सोचिये यदि घर में कोई उनकी बात ही न सुने तो वो क्या करेंगे ? जो उनको अहमियत देंगे वहीँ वो जायेंगे और खुदा न खास्ता यदि जगह गलत हो तो फिर कहने को कुछ रहा ही नहीं। बच्चे गलत और सही का भेद नहीं जानते लेकिन प्यार और नफरत का भेद बहुत ही जल्दी जान जाते हैं!!

पहले परिवार और मन दोनों ही बड़े होते थे लेकिन देखा-देखी  में हम न घर के रहे न घाट के। परिवारों में सही सलाह देने के लिए समय और व्यक्ति ही नहीं रहते।  रही सही कसर फिल्म पूरी कर देतीं हैं।  दुनियां की सारी बातें बच्चे फिल्म से सीखते हैं।  अपराध तो सच कहें तो कोई जानकर नहीं करते लेकिन यदि भूले भटके कोई गलती हो भी गयी तो उसे छिपाने का सिलसिला लगातार चलते ही रहता है।

मेरे मन में अक्सर यह सवाल आता है कि मासूम बच्चे जो गुनहगार बन जाते हैं समाज के चंद शरीफजादोँ के कारण , उनको सजा क्यों नहीं होती ? एक मासूम को बेवजह गुनहगार बनाया जाता है सिर्फ खाना देकर।  हमसे तो बेहतर होते हैं रईसों के घरों में पलते विदेशी नस्ल के कुत्ते , कम से कम उनके खाने पीने का अच्छा ख्याल तो रखा जाता है , इंसान तो जो गरीबी में पलते हैं कुत्तों से भी बदतर बना दिए जाते हैं।

अक्सर गरीब बच्चों को छोटे-मोटे कामों के लिए रखना साधारण बात होती है लेकिन उन मासूम निगाहों से कुछ भी छिपाया नहीं जाता और सब कुछ सीखने का दुर्लभ मौका उनको बहुत ही आसानी से उपलब्ध किया जाता है। यदि इन गलीच जगहों से वो बच सके तो उनका भाग्य, वरना ज्यादातर यहीं से शुरू होता है बीजारोपण एक अबोध मन में जिसको दुनिया की कोई भी ताकत नहीं बदल सकती और सही मौका मिलते ही बीज बड़ा वृक्ष बन जाता है। हम कहानियों और फिल्म में हर बात समझ जाते हैं लेकिन यथार्थ में हमारी आंखों को कुछ नजर ही नहीं आता। कितने ही उम्दा स्तर की फिल्म हम देखते हैं लेकिन जिंदगी में हमें सच्चाई निगलना तो दूर देखना ही नागवार होता है।

छोटे-छोटे बच्चों की खरीद-फरोख्त आम बात है बड़े-बड़े शहरों में , लेकिन उनपर पर्दा डाल दिया जाता है ताकि कानोकान खबर न हो।  इज्जत भी बड़ी अजीब चीज है , उसको बचाने के चक्कर में हम सब कुछ भूल जाते हैं।
अपने बच्चे , परिवार , जिंदगी का मकसद , आपसी रिश्ते और समाज में अपनी जगह , मेरी नजर में ये सब नकली है लेकिन किसी की हिम्मत नहीं होती इन अनदेखे-अनसुने कानूनों को अनदेखा करने की !!

अनगिनत परिवारों में बच्चे थोड़े समझदार होते ही अपनी अलग दुनियां में मशगूल हो जाते हैं। मां -पिता से रिश्ता रखना ही नहीं चाहते क्योंकि बचपन में उनकी बातों को महत्त्व नहीं दिया गया और इस छोटी सी गलती
की सजा वो अपने मां-पिता को देने के लिए हर कुछ करने को तैयार होते हैं , चाहे वो गलत काम ही क्यों न हो!!  सिवाय आंसू भरी आंखो के कुछ दिखता ही नहीं। बड़ी मुश्किलों से बच्चों को बड़ा करने के पश्चात खोना कितना दुखदायी होता है ये तो हम जानते हैं लेकिन अपने बीच की छोटी सी दूरी कम करने का प्रयास करने में अपनी तौहीन समझकर अपना सपनों का संसार उजड़ने देखकर आंसू बहाने वाले अनगिनत लोगों को कैसे समझाएं पता नहीं!!

मैं शाम में अपना समय व्यतीत करने और थोड़ी बहुत सहायता करने के उद्देश्य से घर में क्लास लेती हूं।  मेरे पास बच्चों से लेकर मेरे हमउम्र और कभी-कभी ज्यादा उम्र वाले लोग भी आते हैं।  6 महीने के छोटे से अवकाश में वे मुझसे अपनी परेशानियां बांटने की हद तक करीब आ जाते हैं।  मैं अक्सर यह सोचकर आश्चर्य करती हूं कि मन में इतना भार उठाये ये जवान युवक कैसे खुश रहेंगे और इनको खुश रखना कितना आसान है , क्यों इनके परिवार से इनको ये अलगाव मेरे पास लाता है ?  थोड़ा सा समय ही मैं उनको देती हूं लेकिन इसके अभाव में कितने ही युवक गलत दिशा में भटकते हैं , कौन दोषी है बच्चे या परिवार ?

एक हद तक बच्चे अपनी सारी परेशानियां घर में बता कर हल्का महसूस करते हैं लेकिन वहीं थोड़े बड़े होने के बाद नहीं करते क्योंकि एक छोटी सी दूरी हमारे बीच आ जाती है जो हम जानकार होते हुए भी अनजान बनकर अनदेखा करते हैं और यह दूरी हमारी सारी खुशियां निगल जाती है।  मेरा हर मां-पिता से ये अनुरोध है कि अपने बच्चों से दोस्तों की तरह रहना सीखें ताकि बच्चे भी खुश रह सकें और हम भी , आखिर उनको भी दूसरे मां -पिता नहीं मिलेंगे और हमें भी बच्चे , फिर क्यों ये खींचातानी ? अनगिनत युवक गलत आदतों के शिकार हो जीवन विषमय बना लेतें हैं और लड़कियां गलत जीवन साथी चुनकर पछतातीं हैं लेकिन उसकी जड़ में सिर्फ थोड़ा सा प्यार ही होता है।

मैंने लोगों को मन्नत मांगते देखा है बच्चों के लिये और अनाथ बच्चों को रोते देखा है मां और पिता के प्यार के लिये ठीक उसी तरह सब कुछ होते हुये बेबस परिवारों को भी देखा है।  मेरा मन तरस खाता है उनपर क्यों ये इनके पास इतनी सम्पदा होते इतने गरीब हैं ? लेकिन सच तो ये है की इनका मन नीचे उतरना ही नहीं चाहता और दूर से हर चीज सुन्दर लगती है!!

जिन परिवारों में पैसों का अभाव होता है वो पैसों को महत्त्व देकर बाकी बहुत सारी चीजों को नज़र अंदाज़ कर देते हैं और जो पैसों की कमी देखे बिना पलते हैं वो रिश्तों को ज्यादा अहमियत देते हैं।  ज्यादातर मध्य वर्गीय परिवारों में बच्चे थोड़ी खींचा-तानी में ही पलते हैं लेकिन यदि अच्छी जगह नौकरी मिल गयी तो बहुतायत परिवारों में मां-पिता को बोझ समझने की प्रवृत्ति दिखाई देती है जो मुझे हरगिज़ ठीक नहीं लगती।  मेरे विचार में बच्चों को दूसरे माता -पिता और माता -पिता को दूसरे बच्चे मिलना नामुमकिन है फिर क्यों रिश्तों को ख़त्म करने जैसा व्यवहार करें ? कोई भी शुभ-दिन बिना याद में आंसू बहाये बीत ही नहीं सकता फिर क्यों ये अकड़ जो रिश्तों को खोखली कर दे ?

आजकल तो ये छोटे परिवारों का चलन रिश्तों का दुश्मन है उसपर रही सही कसर हमारी बेवकूफियां पूरी कर देतीं हैं।  रिश्तों के होते रिश्तों के बिना रहने से रिश्तों के बिना रहना ही बेहतरीन होगा।  आजकल तो अधिकांश परिवारों  में सिर्फ एक ही बच्चा देखना आम हो गया।  मामा , मौसी , मामी , मौसाजी जैसे रिश्तों की महक से अनजान ये मासूम बच्चे विदेशों में पलने का भाग्य होते हुए भी बद-नसीब ही होंगे क्योंकि प्यार से रोटी सब्जी खिलाने वाली नानीमा से उनका वास्ता ही न होगा।  गर्मियों में धूप की परवाह किये बिना चोरी-छिपे खेलने का मजा तो वो जान ही नहीं सकते।  इमली , अमरुद , बेर , आम , कटहल खाने का मजा उनको मालूम ही न होगा लेकिन उनको ये कमी महसूस भी न होगी क्योंकि रिश्तों की खुशबू से अनजान ही उनका बचपन बीतेगा।

आज भी नानाजी और नानीमा की याद दिल में एक हूक सी उठाती है लेकिन खुशी है कि हमने इतना निश्छल प्यार पाया जो अब ढूंढेंगे तो भी न मिलेगा।  प्यार की परिभाषाएं बिलकुल ही बदल चुकीं हैं। हम ही बेवकूफों की तरह रेगिस्तान में पानी ढूंढ रहें हैं शायद। भूले न जा सकेंगे वो बचपन के दिन , धूप में मुर्गा बनाने वाले मामाजी, बच्चों के आपसी लड़ाई-झगड़े चुटकियों में सुलझाने वाली और जल्दी-जल्दी गरम और स्वादिष्ट खाना खिलाने वाली नानीमा , हर चीज में मजा लेने वाले नानाजी , हम सबको बैठाकर मजेदार कहानियां सुनाने वाले मामाजी जो हमेशा ही हमारे दिलों और दिमाग पर अपना असर छोड़ गए और जिनसे हमने ग़ज़ल सुनना, समझना सीखा , हम भाई और बहनों की फ़ौज जो हर गर्मी की छुट्टियों का इंतजार करतीं थीं और जिनकी अब सिर्फ यादें हीं हैं , समय तो पंख लगाये उड़ गया।मामाजी की याद आते ही खुद ब खुद आंखें नम हो जातीं हैं।  मेरे बचपन की यादों में मामाजी और नानीमा , नानाजी का ही आधिपत्य है। हम लगभग सालाना एक बार मिलते ही थे। विपिन मामाजी की यादें ज्यादा हैं शायद इसलिए कि उन्होंने हमारे साथ ज्यादा समय बिताया।  छोटी-छोटी बातें भी हमने उनसे सीखीं।  हम दोनों बहनो को चलते समय कैसे घुटने आपस में रगड़े बिना चलने से लेकर छोटी-छोटी कई बातें उन्होंने सिखाईं जो इतना जमाना गुजरने के बाद भी मन में तरोताजा हैं।

इंसान का मन भी एक अजीब होता है , जब पास हो तो अपनी भावनाओं को छिपाता है और दूर होने पर साथ के लिये तरसता है। जब अपने बच्चों को देखते हैं तो एहसास होता है गुजरे समय का। आज भी वो सदाबहार ग़ज़ल कानों में गूंजती है. .... ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो , भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी , मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन , वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी …काश !! ऐसा हो पाता।  

अस्तित्व की पहचान

ऐ मेरे उदास मन , चल दोनों कहीं दूर चलें , मेरे हमदम तेरी मंजिल, ये नहीं ये नहीं कोई और है.. . …                 ऐसे ही सोचते सोचते मेरी जिंदगी चली जा रही है और मैं भी पीछे-पीछे एक मूक दर्शक बना चला जा रहा हूं। कहां तक चलना है , कहां ठहरना है कुछ नहीं पता , समय अपनी रफ़्तार से पंख पसारे चलता रहता है और मैं भी. . .
आज तकरीबन लगभग मेरी आधी उम्र गुजरने के बाद मुझे अचानक यह अहसास होना सभी के लिए उपहासजनक हो सकता है लेकिन मेरे लिए मेरे अस्तित्व की पहचान की शुरुवात कहना ही उपयुक्त होगा। इतनी दूर सफर तय करने के बाद क्यों ये अजीब सी उथल-पुथल मन को बावला बना रही है ? मैंने अपने मन को झिंझोड़ना चाहा लेकिन मेरा मन तो अतीत में गोते लगा रहा था , सबसे बेखबर , जब मैं 25 का था और जिंदगी का हर पड़ाव बेहद खूबसूरत।
पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने नौकरी करना बेहतर समझा और फिर शुरू हुआ एक अनंत सिलसिला चुनाव का , हर किसी जगह में कोई न कोई नुक्स निकल ही जाता था।  यदि मुझे पसंद होता तो भैया मना करते और यदि सबको पसंद होता तो शहर दूर होने से, वहां भेजने की सहमति नहीं मिलती। इसी उधेड़बुन में मैं थोड़ा उदास सा हो चला था।  मेरे कई सहपाठी दूसरे शहरों में थे और कई  व्यापार करने को उत्सुक नजर आ रहे थे , लेकिन कोई भी मुझ जैसा नहीं था जो न इस तरफ न उस तरफ हो।
आखिरकार मैंने सभी का लिहाज करने से बेहतर फैसला करना समझा और पास ही के शहर में कॉलेज में पढाने का अवसर जाने न दिया , हालांकि थोड़ी नाखुशी महसूस की परिवार से अलग होने में, फिर खुद को समझा लिया।  आज मैंने खुद की नज़रों में अपने को एक जिम्मेदार इंसान पाया और एक आत्म तृप्ति महसूस की। दिन सप्ताह और सप्ताह महीने में बदले और मेरी पहली तनख्वाह मिली जिसका हर किसी को बेसब्री से इंतजार होता है।
बचपन से ही मैं थोड़ा डरपोंक रहा हूं और अपने फैसलों को ज्यादा महत्त्व न देकर दूसरों के विचारों को सहजता से स्वीकार कर अच्छा महसूस करता रहा हूं लेकिन यही मेरी एक बड़ी भूल बन चली थी क्योंकि परिवार में मुझसे कोई भी मशविरा लेना जरुरी ही न  समझा गया।  यहां तक कि मेरी शादी का फैसला भी मेरे अलावा सभी ने लेना अपना अधिकार समझा। नौकरी के लिए जैसे मैंने अपने आप को बेहद कमजोर पाया उसी तरह इस विषय में भी।  अब चुप रहना गलत लगने लगा था सो मैंने अपनी छोटी बहन से कहा कि मैं अभी शादी नहीं करना चाहता और छोटी की शादी के बाद ही अपने बारे में सोचूंगा।  ताज्जुब हुआ कि मेरी बात का कोई विरोध ही नहीं हुआ , तो फिर मैं क्यों बेवकूफ की तरह हर मामले में अपनी राय ही न जाहिर करने की गलती इतने सालों से करता रहा ? यहीं तो संस्कारों के नाम पर हम  मारे जाते हैं।
पिताजी का असमय देहावसान मुझे बेहद कमजोर और भैया को सब फैसले करने का अधिकार अनायास ही दे गया जिसका कोई भी विरोध मैंने किया ही नहीं।  भैया जैसा कहते वैसा ही होता और सिवाय मेरी  नौकरी के मैंने कभी कोई कमी भी महसूस न की।  अम्मा तो सिर्फ नाम के लिए हां या ना कहतीं थीं और इस बीच लगभग 15 साल गुजर गए और हम सभी पहले की तरह नादान न रहे।  लेकिन फिर भी सबकी उम्मीदें वैसी ही हैं जैसी कभी थीं। परिवार की जिम्मेदारियों की ही तरह महत्त्व भी देना जरूरी था जो जरूरी ही न समझ गया , शायद सबकी नज़रों में मैं छोटा ही रह गया।  बहन की शादी , फिर मेरी शादी और फिर परिवार में बच्चों का आगमन सब कुछ बदलने लगा था लेकिन अब भी मुझे मेरा अस्तित्व होने का भान ही न था।  मेरी पत्नी विभा कभी ताने देती तो थोड़ा दर्द सा होता था जो तुरंत ही गायब भी हो जाता था , और ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार से चलती रही।
मेरे दोनों बेटों को मैंने बिना किसी भेद के पालना चाहा और कुछ विरोध के बाद परिवार से अलग होने का फैसला किया , अपने लिए नहीं विभा और बच्चों के लिए।
मैं मेरी तरह मेरे दोनों बेटों को देखना नहीं चाहता था, बिना रीढ़ के कैसे भला कोई जी सकता है ? तो फिर इतने साल मै कैसे जिया ? क्यों जिया ? क्या मिला ? इज्जत , प्यार या कुछ भी नहीं ? जिसे मैंने इज्जत समझा उसे सबने नाकामी कहा और जिसे मैंने संकोच कहा उसे सबने डर का नाम दिया।
सच तो था न , आज जब सभी अपनी इच्छाओं को महत्व देना बेहतर समझते हैं मैं हमेशा दूसरों को ही बातों को महत्त्व देता रह गया और जिंदगी के हर पड़ाव पर खुद को बहुत पीछे पाया।  शिकायत करता भी तो कैसे ? यह तो मेरा अपना स्वभाव था और जिसकी पिताजी ने हमेशा ही बड़ाई की थी।  तो क्या मैंने अपने पिताजी के अनुसार खुद को ढाला और उनके बाद खुद को अकेलेपन में खो दिया ? उनके बाद मैंने खुश रहना , अपने लिए कुछ पूछना यहां तक कि खाने पीने में भी एक अजीब सी उदासी से खुद को घिरा पाया मानो मैं अनाथ हो गया और दूसरों की दया पर ही जी रहा हूं।  ऐसा किसीने कहा तो नहीं लेकिन मैं ऐसे ही ढल गया।
 मेरी दुनियां वीरान थी जिसमे ख़ुशी का नामोनिशान न था। जैसे तैसे पढ़ लिया और नौकरी भी कर ली , शादी के बाद बच्चे भी बड़े हो चले थे।  एक दिन अनायास ही मेरे छोटे बेटे ने पूछा, "पापा आप क्यों हमेशा उदास रहते हैं? ,आपको क्या चाहिए? बोलो न, मैं बड़ा होकर लाऊंगा" मेरी आंखें छलछला गयीं।  ठीक ऐसा ही तो मैंने भी सोचा था अपने पिताजी के बारे में ! नहीं हरगिज नहीं , मैं अपने बेटे को उसी सांचे में ढलने नहीं दूंगा , हरगिज नहीं ! जैसे मैं गहरी नींद से जागा होऊं।
अक्सर ही परिवारों में ऐसा होता है और उसमे कुछ गलत भी नहीं।
बच्चों को उनके अस्तित्व का भान होने की एक उम्र होती है, जब सभी उनपर ध्यान देते हैं यदि समय रहते उनको ये एहसास प्रबलता से होता हो तो सब सही बन जाता है और नहीं तो फिर कोई उनपर ध्यान ही नहीं देते और हमेशा ही मेरी तरह एक अजीब से एहसास में जिंदगी गुजारने पर मजबूर हो जाते हैं।
मैंने एक संकल्प लिया और पूरी तरह दृढ़ता से उस संकल्प को साकार रूप देने में जुट गया। 

रिश्तों की एहमियत

हर रिश्ते की एक एहमियत और खुशबू होती है जो प्रायः हमें बिछोह से न केवल विचलित अपितु मृत बना जाती है।  लोग कहते हैं समय से बेहतर कोई मरहम नहीं लेकिन यह हर रिश्ते के लिए सही नहीं।  कुछ रिश्ते आजन्म हमें अपनी कमी का एहसास दिलाते ही रहते हैं।

मां -पिता , भाई -बहन , पति -पत्नी और लगभग हर रिश्ते में एक मिठास और सुंदरता है जो अन्यत्र दुर्लभ है लेकिन उनकी खुशबू बरक़रार रखने के लिए हमारी तरफ से कितनी कोशिशें करते हैं यह मद्दे नजर रखने काबिल है।  बचपन तो दूसरा कोई चारा न होने से साथ बिताना ही पड़ता है लेकिन जब हम पंछी बनकर पंख पसारे दुनिया का चक्कर लगाने के बाद लौटने पर अपनों की याद करते हैं और न मिल पाने की कसक हूक में बदलते देखकर अपनी आंखें बिना किसी के ध्यान में आये पोंछते हैं , तब ही तो पता चलता है वियोग का और रिश्तों की गहराई का।  चाहे हम कितना भी दम भर लें दोस्ती का लेकिन जो रिश्ते भगवान बनाता है वो कभी भी कमजोर नहीं होते।

मैं सबसे दूर यहां दक्षिण में आ तो गयी लेकिन जब पापा के दशगात्र में सबसे मिली तो मुझे ही ताज्जुब हुआ क्योंकि मेरी आंखें लगातार बहती ही जा रहीं थीं।  मेरे मौसाजी ने जो अब  न रहे , मेरा सर सहलाकर कहा , "इतना सारा प्यार मन में छुपाये कैसे नीलू तू वहां रहती है ?" मैं तो सच कैसे जीती हूं समझ न पाई लेकिन एक कमी सी है जो शायद कभी पूरी ही न हो पाएगी। कभी कभार लगता है काश मैं एक पंछी होती !!

लगभग यहां आकर 23 साल हो गए लेकिन आज भी मन में एक कमी महसूस होती है और एक दर्द भी , जिसकी पूर्ति सिर्फ उन रिश्तों से ही हो सकती है , हालांकि यहां मैंने नए रिश्ते बनाये लेकिन फिर भी मन में एक अजीब सा खालीपन अक्सर ही मुझे विचलित करता है। क्या करें, शायद इसे ही किस्मत का खेल कहते हैं !

मैंने दक्षिण में आकर लगातार खुद को कई तरह की सामुदायिक विकास और सुधार की प्रक्रियाओं से जोड़ रखा है और इसमें मैं अपनी कमियों को भूलकर खुश रहने में सफल होती हूं।  शहरों की अपेक्षा हम ग्रामों में ज्यादा गहराई से जुड़ने का मौका पाते हैं और एक तृप्ति भी जो जीवन को स्थगित नहीं होने देती। मैंने शायद ही कभी बड़े शहरों में रहना पसंद किया हो , मेरे दोस्त मुझे अक्सर ही झिड़कते थे और मजाक भी उड़ाते थे क्योंकि मैं बेहद ही सादगी से रहती थी और अब तक वैसी ही हूं जैसी थी , लेकिन मैं इसे एक अच्छी बात समझती हूं कि मैं एक बिलकुल ही नए परिवेश में रहने में सफल हो सकी। 

शायद आप भूल गए

इंसान को भगवान ने बेहद संवेदनशील , समर्थ और बुद्धिमान बनाया ताकि वह हर स्थिति में जीत कर एक मिसाल साबित हो लेकिन हद हो गयी यार इस शख्स ने तो भगवान को भी ललकारा अपने घमंड में चूर होकर। एक दिन यूं ही भगवान से क्यों न मिलें सोचकर एक महाशय निकले।  सीधे जाकर भगवान से कहा मैं आपसे कुछ प्रश्न करना चाहता हूं।  भगवान ने कहा ठीक है।

मैं क्यों आपकी पूजा करूं ? पहले जब इंसान ने किसी भी तरह की प्रगति नहीं की थी तब तक ठीक था लेकिन आज के समय में जब मैं अपना प्रतिरूप भी बनाने की हैसियत रखता हूं और अपनी मर्जी से जब चाहूं धरती और आसमान पर रह सकता हूं , मुझे कोई वजह नहीं दिखती कि मैं आपकी पूजा करूं।  उसने स्वाभाविकतया  ही जवाब की अपेक्षा मेँ भगवान का चेहरा थोड़े घमंड से देखा।  प्रश्न सुनकर भगवान मुस्कुराये।

उन्होंने पूछा ,"मैंने तो आज तक किसी से मेरी पूजा करने की अपेक्षा ही नहीं की औरऔर न ही कुछ मांगा।  ये तो आप लोग अपनी ही मर्जी से मुझे बिठाकर सवालों की बौछार से परेशान कर रहे हो।"

"ठीक है ऐसा ही समझें जैसा कि आपने कहा , क्या आप अभी इसी समय एक इंसान बना सकते हैं ?"

वह गर्व से उपेक्षा भरी हंसी हंसकर इस सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हो गया।  भगवान ने उत्तर जैसा कि अपेक्षा थी पाया।
 "जरूर , अभी इसी वक़्त,"
"आप जैसे इन्सान बनाएंगे , ठीक वैसे ही मैं बनाकर दिखाता हूं ,"

वह यह कहकर मिट्टी लेने को झुका , तब भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा , "नहीं ,नहीं  , नहीं  , यह तो मेरी बनाई दुनिया है , तुम तुम्हारी दुनिया से मिट्टी लेकर आओ "

यह सुनकर वह उतरा चेहरा लिए लौट आया।  भगवान ने अपना काम संभाला।

गलत और सही

आज शाम अचानक पड़ोस के घर से तेज आवाजें आने से मेरा ध्यान सहज ही वहां चला गया , नजारा बेहद ही नाजुक था।  पति और पत्नी किसी छोटी सी बात पर झगड़ रहे थे , बच्चे किसे गलत और किसे सही कहें समझ नहीं पा रहे थे।  चारों तरफ चिल्लाहट सभी को परेशान और लज्जित कर रही थी।  बातें बिना वजह बड़ी होती जा रही थी और आखिरकार नौबत "क्या तुम्हारे बिना मैं जी नहीं सकता/सकती?" तक जा पहुंची।  हम पडोसी कुछ भी न कर सके क्योंकि यह उनका जातीय मामला था और हस्तक्षेप नागरिकता की सीमा से परे था।

अगले ही दिन मेरी सहेली ने आनन फानन में घर छोड़ने का फैसला गुस्से में कर लिया , जबकि हमने समझाने की बहुत कोशिशें की लेकिन वो अपने पति को एक सबक सिखाना चाहती थीं। एक हद तक समझाने के बाद हमने चुप रहना बेहतर समझा और झगडे की आखिरी हद अलगाव में तब्दील हो गयी।  जब तक एक छत के नीचे थे किसी न किसी तरीके से समझौता होने की गुंजाइश थी लेकिन अलग होने के बाद गुस्सा नफरत और अलगाव एक अजीब तरह के प्रश्न ले आया।   क्यों मैं ही पहल करूं ? क्या मुझे अकेले जीना नहीं आता ? क्यों हमेशा मैं ही स्त्री होने की सजा भोगूं ? यदि उनको पत्नी की जरूरत हो तो आने दो समझौते के लिए , इस तरह की बातों ने उनकी पारिवारिक स्थिति को एक नया रूप देकर विकृत कर दिया और मासूम बच्चे मां -पिता के अहम भाव के तहत मूक दर्शक बन गए। 

लगभग एक महीना बीत गया लेकिन दोनों ने चुप्पी नहीं तोड़ी , महीने और फिर साल , आज लगभग 5 सालों के बाद भी जब मैं उनके घर के सामने से गुजरती हूं तो अनायास ही आंखें भर आती हैं क्योंकि उन्होंने बच्चे अच्छी तरह से पाले थे लेकिन सिर्फ थोड़ी सी अकड़ की वजह से दोनों ने बच्चों को अनाथ बना दिया। लगभग हर परिवार में छोटे मोटे झगडे होना आम बात है लेकिन अलगाव की हद तक उनको अहमियत देना बेहद ही गलत है क्योंकि अकड़ में पति -पत्नी मासूम बच्चों को बेवजह सजा देते हैं और उसकी छाया जीवन भर उनका पीछा नहीं छोड़ती , परिवार में बेहद मुख्य चीज आपसी समझ और बच्चों के मानसिक विकास पर कोई बुरा असर न पड़े इस बात का ख़याल होता है , उसके बाद ही हम गरीबी या अमीरी में उनकी परवरिश कर रहे हैं , आता है। मेरे विचार में हर एक परिवार में ऐसी चीजों का ध्यान रखना एक कर्तव्य होना चाहिए ,अन्यथा बच्चे शादी से ही डरकर भागने लगेंगे। 

आज पहली बार

मैंने अपने मन की उलझन सुलझाने का फैसला कर लिया।  यदि  लिखने से मन हल्का हो तो कोई हर्ज़ नहीं लिखने में। मुझे मेरे बचपन के दिन याद हो आये और साथ ही कुछ बेहद कड़वे क्षण भी जिन्हे मैं शायद कभी भूली नहीं। हमारे परिवारों में बच्चों से कई बातें छुपाई जाती हैं और वही बातें जब बाहरी दुनिया हमें सिखाती है तो उसका स्वरुप घिनौना होता है और दर्दनाक भी।
हम सब बच्चे खेलने की एक निश्चित जगह थी जहां ज्यादा जगह थी और बम्बई के छोटे घरों में बच्चों को सब कुछ मिलता है सिवाय जगह के और यदि जगह मिले भी तो वो रईसजादों को ही नसीब होगी। हम जहां खेलते थे वहीँ थोड़ी दूरी पर एक घर था जिसमे एक परिचित महिला अपने मा -पिता के साथ रहती थी। उनकी उम्र भी लगभग 60 होगी लेकिन उनके पिता की घिनौनी हरकतों का उनकी उम्र से कोई रिश्ता ही नहीं था।  खेलने वाली छोटी लड़कियों को बुलाकर ये महोदय अपनी काम वासना की तृप्ति में उनसे अपने शरीर पर मसाज़ करवाते थे।  मेरा दिल तो करता था कि उनकी हड्डी पसली एक कर  देती लेकिन उम्र आड़े आ गयी और महोदय बच गए।  मैंने सिर्फ अम्मा से कहा हर ऐरे गैरे को इज़्ज़त देने की जरुरत नहीं , उनकी समझ में आया नहीं तो फिर साफ़ साफ़ कह बैठी, आइंदा मुझे उनके घर भेजना मत और उनको इज़्ज़त देने को भी मत कहना।
यह अनुभव मेरे कच्चे मन पर एक गहरी चोट थी।
बीच में पापा की तबियत ठीक नहीं थी तकरीबन 5 सालों तक उनका लगातार इलाज़ करवाने में बजट शब्द गुम  हो गया या दब गया भार में पता नहीं।  हमारे प्रिंसिपल हमें घर आकर लिवा ले गए, बीच में कुछ समय पढ़ाई छोड़ने की नौबत आने पर जब सभी बच्चे दिखे नहीं तो प्रिंसिपल सर का माथा ठनका और वो सीधे घर आकर अपने निश्छल और प्यार भरे मन से मेरे मन पर एक गहरी छाप छोड़ गए जिसे मै आज तक एक धरोहर समझकर जितना मुझसे जमता है गरीब बच्चों को पढने में मदद करने से पीछे नहीं हटती।
एक शिक्षक महोदय ने मुझसे कहा मै सिर्फ तुम्हे शाम में पढ़ाई में सहायता करूंगा, क्लास के बाद नीचे कमरे में रहना।  मैंने सारे लड़कों को बेंच के नीचे छुपकर इशारा करने पर चिल्लाने कहा साथ ही प्रिंसिपल सर से जल्द ही नीचे कमरे में सभी शिक्षकों के साथ आने कह दिया ।  महोदय सबसे अनजान आये और दरवाजा भी बंद किया। जैसे ही पीछे मुड़े दरवाजे पर एक दस्तक और दरवाजा खोलते ही सारे लड़कों और सामने प्रिंसिपल को देखते ही उनके होश उड़ गए।  महोदय रंगे हाथ पकडे गए और सिवाय नौकरी छोड़ने के दूसरा कोई चारा रहा नहीं।
आज भी जब मै सोचती हूं तो दंग रह जाती हूं अपनी समझ पर।
इस घटना ने मन पर फिर एक छाप छोड़ दी और मैंने लोगों के ऊपरी मुखौटे के पार देखना सीखा।
एक दिन यूं ही हमारी एक पड़ोसिन ने जो उस समय मुझसे बड़ी थीं और मै सिर्फ 15 की थी , अम्मा से मुझे बाज़ार भेजने का आग्रह किया तुरंत इन्होने हां कर दी और मै उनके भरोसे चल दी।  बाजार में जाते ही वो गायब हो गयीं और मै अकेली रह गयी। मैंने थोड़ी सब्जियां खरीदीं लेकिन हर जगह "चिल्हर नहीं" का जवाब मिला। एक महोदय जहां मै खरीदती वहां पैसे देते मेरे पीछे लगे रहे।  मैंने अनजान बनकर गुस्से से बात कर उन दुकानो में पैसे दिए और डर से तेज तेज कदम बढ़ाये।  उस पड़ोसिन का दूर तक अता पता नहीं था। ये इंसान भी मेरे पीछे ही लगे रहे। मैंने रास्ता पार करने के भीतर चाय , दूध पीने का आमंत्रण भी किया जिसे मैंने उपवास के बहाने मना कर दिया।  जैसे तैसे स्टेशन नजदीक आया और मेरी जान में जान आयी।  पहले दर्जे का डब्बा ही सामने था , मैंने झट से चढ़ कर ठंडी चैन की सांस ली लेकिन जैसे ही ट्रैन चली पीछे उसी आदमी को देख मेरे होश उड़ गए।
 अब तो बेहद ही सतर्कता से दिमाग ने काम करना था।  मैंने देखा सिवाय हमारे दूसरा कोई था नहीं , मैंने बैग

 खिड़की वाली सीट पर रखा और बातों का क्रम जारी किया ताकि वो इंसान बना रहे।  जाहिर था वो अच्छा इंसान  था नहीं लेकिन दूसरा कोई रास्ता भी नहीं बचा। मैंने पूछा , कहाँ जायेंगे अंकल और उसने कहा थाना , मैंने
 कहा   मुझे भी वहीँ जाना है।  वो थोड़ा निश्चिन्त दिखा , वहां से 4 मिनट की दूरी मैंने तय करनी थी सो बातों में  उलझाना जरूरी था ताकि मैं किसी आफत में न फंसूं। मैंने दरवाजे पर ही खड़ा रहना बेहतर समझा लेकिन  लगातार ये इंसान मुझसे भीतर आने कहता रहा जिसे मै नजरअंदाज करती रही।  थोड़ी देर में स्टेशन आ गया    और मैंने झट से उतरकर पेपर स्टॉल पर जो लड़के थे  उनसे सब बातें बता कर उसकी चम्पी कर दूसरी ट्रैन में    मेरे बैग के साथ आने का अनुरोध किया।  थोड़ी ही देर में दोनों मेरे बैग के साथ उसकी मरम्मत कर लौट आये।
लगभग मेरी मां की उम्र के उस आदमी ने मेरी जान ही निकाल दी साथ ही एक सवाल भी मन में उठाया की एक बच्ची यदि होशियार न हो तो हर तरफ से उसको खतरों से बचाने कोई मिले ये जरूरी नहीं सो हर लड़की को अपनी सुरक्षा के तरीकों में माहिर होना ही बेहतर।
घर आकर मैंने अम्मा से कहा, आइन्दा हर ऐरे गैरे के साथ बाजार भेजने का ख्याल दिमाग से निकाल देना। यदि मेरी हिम्मत साथ न देती तो सोचो क्या होता ? भगवान का शुक्रिया अदा किया कि मुझे सही समय पर जूझने की ताकत तो दी। 

परिवार ही प्रेरणा

बचपन तो गुजर ही जाता है लेकिन यादों की धरोहर आजीवन हमें सुख और प्रेरणा देती हैं।  बहुतायत लोग सिर्फ पैसों से ही सुख मिलता है सोचते हैं लेकिन ऐसा नहीं है। बच्चों की परवरिश में पैसों से ज्यादा महत्व छोटी छोटी बहुत सारी चीजों का होता है जिन्हे हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं। बचपन की यादों में यदि हम ध्यान दें तो सिर्फ निश्छल प्यार ही याद रहता है। बच्चों की सही जगह पर तारीफ करना उनको प्रेरित करने के लिए अति आवश्यक होता है।  बहुत लोगों को मैंने दुःख से कहते सुना है कि उनको बचपन में किसी ने प्रोत्साहित नहीं किया अन्यथा वे भी कुछ कर दिखाते।  40 की उम्र में उनका ये कहना उनके अपरिमित दुःख की अभिव्यक्ति ही तो है !
बच्चों को खाना और कपडे देना ही काफी नहीं , जहां जरूरत हो वहां उनको अनुशासन से रहना भी सिखाना बेहद जरूरी है। जीवन में बिना कठिनाइयों से जूझे हम कुछ भी नहीं कर सकते ।  बहुत सारे परिवारों में बच्चों को पूरी तरह स्वतंत्रता दी जाती है , जहां मां -पिता दोनों ही कमाने जैसी स्थिति हो वहां अधिकांशतः ये गलती देखी जाती है और नतीजे भी अच्छे नहीं होते लेकिन उनकी जड़ में अनुशासन की कमी ही होती है।

किताबें पढ़ने की आदत से बेहद ही सरलता से बच्चे कई बातें सीख जाते हैं।  भाषा का अच्छा ज्ञान भी स्वाभाविक ही होता है।  बचपन की ये आदत उनके भविष्य में काफी सहायक होगी। बचपन से ही इस आदत का होना उनके चारित्रिक विकास के लिए भी वरदान होगा। अधिकांशतः बच्चों के गलत दिशा में जाने के लिए चिंतित होना स्वाभाविक है लेकिन किताबों का चयन अच्छा होना चाहिए और इसमें हमारा मार्गदर्शन जरूरी है।

कई परिवारों में बच्चों को प्रोत्साहन देने बड़े नहीं होते और ठीक इसके विपरीत कई परिवारों में बड़े प्रोत्साहन नहीं देते , छोटी सी बातें बड़ा असर करती हैं और यह सिर्फ मां -पिता और गुरु ही कर सकते हैं , आजीवन मन पर इन बातों का प्रभाव रहता है। आज भी मेरे शिक्षकों की यादें मन में ताजा है। हर एक अच्छे प्रयास में उनका मार्गदर्शन भूला नहीं जा सकता।

रिश्तों में अपनापन बेहद ही आवश्यक होता है इसमें छिपी है उनके स्वाभिमानी और समर्थ बनने की कुंजी। जीवन में बहुत कुछ हासिल करने वालों से यदि पूछें तो उनकी परवरिश से ज्यादा उनपर अभिभावकों के प्रेम भरे व्यवहार का अधिक प्रभाव रहा है। जरूरी नहीं कि हम रईस हों ,प्यार तो पैसों से नहीं खरीदा जा सकता। बच्चों को हमेशा ही बच्चे न समझें उनमें आत्मविश्वास से निर्णय लेने जैसी क्षमताओं का विकास भी होना चाहिए और हमने उनपर भरोसा भी करना चाहिए , यदि हम उन्हें छोटा ही समझते रहें तो वे कब बड़े होंगे?
हमारे आपसी रिश्तों की मजबूती बच्चों को हमारे करीब लाएगी और यदि दुर्भाग्यवश कोई गलती भी हो तो निसंकोच हमें बताने की हद तक उनको हम पर भरोसा भी होना बेहद जरूरी होता है।  असलियत हमसे छुपाएंगे तो उनका मार्गदर्शक कौन होगा ? बाहरी लोगों से वे कैसे अपनी परेशानियां बांटेंगे ? यदि ऐसा हो भी तो उसमे दोनों ही दुखी होंगे तो क्यों न बच्चों से हम थोड़ी दोस्ती रखें ? एक नए रिश्ते की जड़ हमें बचपन में ही मजबूत कर लेनी चाहिए।
प्यार में असीमित शक्ति है जिससे हर बदलाव संभव है , जरूरत सिर्फ कोशिश की है।  हमारा निस्वार्थ प्यार ही उनके कोमल मन में गहरे तक जड़ें जमाकर उन्हें सफल बनाएगा। मैंने बचपन में बहुत ही करीब से देखा और  सीखा, कैसे एक परिवार में बिखराव सहजता से बच्चों की मानसिकता बदल सकता है , फिर कुछ भी बदलना नामुमकिन हो जाता है क्योंकि जो बातें मन में गहरे तक समातीं हैं उनको पूरी तरह निकालना आसान नहीं होता। इसमें सिर्फ मां -पिता होना ही काफी नहीं , बुद्धिमान होना बेहद जरूरी है।
गलतियां करना स्वाभाविक है लेकिन उनका निराकरण हम कैसे करते हैं ये बच्चे बारी
की से देखते हैं और अपनी जिंदगी में भी उसका अनुकरण करते हैं इसलिए हमेशा ही हमारा सतर्क रहना जरूरी होता है। गलतियों का सुधार कैसे किया जाए ये हमें अवश्य ही सिखाना चाहिए , न कि सारे निर्णय हमें लेने चाहिए।
यदि हमारे बीच किसी भी तरह की परेशानियां हों तो उनका प्रदर्शन बच्चों के सामने न करना ही बेहतर , हमपर न सिर्फ उनका भरोसा रहना चाहिए बल्कि हमें उनका आदर्श भी होना चाहिए। यदि हम उनके सामने ही झगड़ें तो उनका कमजोर होना गलत नहीं।
हमारा व्यवहार उनके लिए हमेशा ही समझदारी भरा होना चाहिए , जीवन में वे हमें हर कदम पर याद करने जैसा हमें उदहारण प्रस्तुत करना चाहिए। मैंने कई लोगों को आत्महत्या करते देखा है लेकिन कारण बेहद ही साधारण होते हुए भी यदि अपनी जिंदगी ख़त्म करने में वे नहीं हिचकते तो साफ़ जाहिर है कि उनको घर में प्यार देने और समझने वाला कोई  नहीं है।  छोटी छोटी बातों पर गौर करना अच्छी बात है क्योंकि हर बच्चा अपनी परेशानियां सबसे कहे ये जरूरी नहीं।  हमारा उनपर पूरा ध्यान रखना भी प्यार ही तो है।

कई परिवारों में रिश्ते सिर्फ पैसों के डर से तोड़े जाते  हैं , शायद हमसे मदद पूछें , यह बिलकुल ही गलत तरीका है क्योंकि रिश्तों में जो मिठास है वो अन्यत्र कहीं नहीं , उसको कायम रखना और दूसरों की ताकत बनना हर तरह से अच्छा होता है।