Wednesday, October 28, 2015

ज़िंदादिली की मिसाल

आज भी याद आने से आंखें छलक जाती हैं  मामाजी के देहांत और उस समय छोटी सी मीशा का मासूम चेहरा , हम सब जड़ हो गए थे दुःख और असमय इस तरह के कठोर आघात से। पूरे परिवार पर मानो बिजली गिर गयी हो ! तराजू में तौल तो नहीं सकते प्यार को लेकिन मामाजी हर एक दिल की धड़कन थे ! सच कहें तो मामाजी की मौत नहीं हुयी बल्कि उन्हें मारा गया था क्योंकि वे बाकी लोगों के रास्ते में एक रूकावट थे ईमानदारी की वजह से और उनकी बुद्धिमानी से चोरी पकड़ने से बड़े से बड़े अधिकारी भी कांप चुके थे। यदि वे रहते तो संभवतः कई बड़े अधिकारी भी ब्लैक लिस्ट में आ चुके होते ! खैर ये तो पुराने जख्म हैं जो हमेशा ही हरे रहेंगे।  

सभी का मशविरा था कि चूंकि मीशा छोटी थी उसे मामाजी का चेहरा न दिखाया जाए क्योंकि मासूम मन में ये गहरी चोट होगी , लेकिन आखिरकार उसे नजदीक ले जाकर मामाजी का चेहरा दिखाया गया लेकिन मृत्यु का उल्लेख किये बिना , वह क्षण जैसे कैमरे में लिया फोटो हो आज तक मन में कहीं गहरे तक अंकित है।  उसके बाद सब कुछ ख़त्म हो गया , धीरे धीरे हम सब मीशा और रुनझुन में मामाजी को देखने लगे और समय अपनी रफ़्तार से भागता रहा लेकिन रायपुर भी धुंधला हो चला था।  जान नहीं रही थी रायपुर में।  बेटी ! उस बुलाने के अंदाज़ में मामाजी जैसे जान डाल देते हों ! फिर कभी उस शब्द में उतनी मिठास नहीं लगी जैसे मामाजी के बुलाने पर लगती थी। वाह रे वाह , मामाजी की याद अभी भी मेरी आंखों से झड़ी बनकर बरस रही है , न जाने क्यों इस सप्ताह मामाजी ही छाए हैं मन में !

उस दिन मैंने कुछ हिचकते हुए मीशा का नंबर डायल किया , क्या पता वो क्या सोचेगी लेकिन फिर भी मैंने थोड़ी देर बातें होने पर मैंने पूछा,मीशा तुमको तो शायद मामाजी की याद न हो , उसपर तुरंत मीशा ने कहा "नहीं दीदी मुझे अच्छी तरह पापा की याद है " मेरी बोलती ही बंद हो गयी।  इतने ज़िंदादिल मामाजी की दोनों बेटियां बेहद ही अच्छी हैं लेकिन चंद लोगों की गलत साजिश ने उनसे उनका आधा बचपन और सागर जैसे प्यार ही प्यार भरे दिलवाले मामाजी को छीन लिया , इसे विधि का विधान कहें या सजा लेकिन मेरे मन में एक कसक मरते दम तक रहेगी कि मैं अपनी बहनो से दूर बहुत ही दूर रह गयी ! यदि मामाजी होते तो हम सबका जीवन कैसा होता ? निःसंदेह मेरी दोनों प्यारी बहनो को भी हमारी ही तरह दिल लबालब भरा होता प्यार भरी उनकी यादों से। मीशा को थोड़ी बहुत यादें होंगी लेकिन रुनझुन तो बहुत ही छोटी थी , उससे मेरी बात भी नहीं हुई है सिर्फ उसकी तस्वीरें ही देखकर खुश हो लेती हूं।  भगवान से प्रार्थना करती हूं कि मेरी प्यारी मासूम बहनो का चेहरा देखने का सौभाग्य मुझे जल्द ही मिले।   

Sunday, October 18, 2015

आधुनिकता

आजकल आधुनिकता के नाम पर अपने संस्कार भी भुलाने हम तैयार हो चुके हैं लेकिन ये चार दिनों की चांदनी  जाने के बाद शायद हमें कुछ कहने का भी हक़ नहीं मिलेगा क्योंकि सोच तो हम ही बदलने आतुर हैं। पुराने ख्यालों से खुद को अलग करने की यह आतुरता हमें शायद ही रास आये।  मन में गहरे तक अपने संस्कारों से जूझना साधारण बात नहीं होती लेकिन हम पीछे हटना नहीं चाहते और आगे जाने से डरते भी हैं। स्त्रियों ने स्वतंत्रता के नाम पर कम से कम कपड़ों में गुजारा करने का फैसला लिए काफी समय हो गया लेकिन आज तक पुरुषों ने हमारा अनुकरण नहीं किया।  हमारे कपड़ों के चुनाव से हम बिना कहे बहुत कुछ कहते हैं।

विचारों से हम आज भी आधुनिक नहीं बन सके हैं।  विदेशों में जिस आसानी से जीवन साथी चुने या रद्द किये जाते हैं क्या उतनी सहजता से हम अपने परिवार की स्त्रियों को स्वतन्त्रता देंगे ? हरगिज नहीं।  हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं वैसे ही हम अपनी सुविधा के हिसाब से मुखौटे पहनने जैसे विचार बदलते हैं।  यदि हमारी बहने सरे आम देर रात घर आएं तो हम कतई अनुमति नहीं देते और वहीँ किसी घर की बहन अपने साथ देर रात गए रहने पर आधुनिकता का चोगा निःसंकोच पहनते हैं। क्यों ये दोहरी विचारधारा जो स्वार्थ के अनुसार बदलते हैं ?

आजकल लड़कियां सरेआम लड़कों के साथ घूमने फिरने में और तस्वीरों के आदान प्रदान तक सहजता से रिश्ते निभा रहीं हैं। अस्पतालों में लडकियां पेट दर्द की शिकायत लेकर मां के साथ आतीं हैं लेकिन खुद के मां बनने की थोड़ी सी आशंका उनके मन में नहीं होती और यदि जान भी जायें तो गिड़गिड़ाने पर उत्तर आतीं हैं शादी के लिए , यही तो एक वजह है लड़कियों के मन में पुराने संस्कारों की जगह आज तक आधुनिकता ने नहीं ली। मां बनने की हद तक जाने से न डरने वाले क्यों फिर सामाजिकता के नाम पर भागते हैं ?  हम पूरी तरह से आधुनिक नहीं बन सकते , फिर क्यों ये देखा देखी का ढोंग ? हमारे बच्चों को हम जो दे सकते हैं उसमे बहुत बड़ी धरोहर है हमारे उच्च संस्कारों की। हम जहां भी जाएं हमारे संस्कार हमें इज्जत और प्रेम के हकदार बनाते हैं। विदेशों में अब सारी आधुनिकता से तंग आकर भारतीय संस्कारों का अनुकरण करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

हम शादी में जितना दहेज़ बेशर्मी से मांगते हैं उतनी ही बेरहमी से बहुओं को परेशान भी करते हैं जो कि आधुनिकता के नाम पर कलंक है। आधुनिक सिर्फ कपड़ों और खाने में नहीं  हुआ जा सकता बल्कि विचारों से आधुनिक होना चाहिए।  हमारे देश में उनके जमाने से आगे विनोबा भावे , राजाराम मोहन राय , रविंद्रनाथ टैगोर , भारती  जैसे महान विचारों वाले लोग आज तक हमें प्रभावित करते आ रहे हैं।  आवश्यक है एक बदलाव जिसे हमने व्यवहार में लाना है।